महाकुंभ में पानी में तैरता राम नाम का पत्थर बना आकर्षण और श्रद्धालुओं का कौतूहल

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प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ मेला इस बार चमत्कारी घटना का गवाह बन रहा है. यहां पानी में तैरता हुआ एक पत्थर है, जिस पर ‘राम’ नाम लिखा हुआ है. यह पत्थर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र बन गया है. लोग इस पत्थर के दर्शन करने पहुंच रहे हैं. यह पत्थर महाकुंभ में आए श्रद्धालुओं को एक नई अनुभूति दे रहा है, जो इसे देखकर चमत्कृत हो रहे हैं.

महंत प्रश्नतगिरी ने इस पत्थर के बारे में जानकारी दी. उनका कहना है कि यह पत्थर रामसेतु का हिस्सा है, जो रामेश्वरम से लाया गया है. महंत ने बताया कि जब नल और नील ने लंका तक पुल बनाने के लिए पत्थरों का इस्तेमाल किया था, तो यह वही पत्थर है, जिस पर भगवान राम के चरणों के निशान हैं. इस पत्थर को देखकर श्रद्धालु राम के स्वरूप का दर्शन करने आते हैं.

महाकुंभ के दौरान इस पत्थर के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आ रहे हैं. यह पत्थर धार्मिक प्रतीक के साथ श्रद्धा और विश्वास का केंद्र बना हुआ है. यहां आकर लोग राम के नाम से अंकित इस पत्थर को देख रहे हैं, और यह उनके लिए एक दिव्य अनुभव सरीखा है.

कुंभ कैसे शुरू हुआ, क्या है इसके पीछे की मान्यता?

कुंभ मेले की उत्पत्ति सनातन धर्म की पौराणिक कथाओं, विशेष रूप से समुद्र मंथन की कथा से होती है. इसके मुताबिक, दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण जब इंद्र और देवता कमजोर पड़ गए तो असुरों ने देवलोक पर आक्रमण करके उन्हें परास्त कर दिया था. असुरों से पराजित होने के बाद सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए और उन्हें सारा व्रतांत सुनाया. तब भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीर सागर में मंथन करके अमृत निकालने को कहा. सारे देवता भगवान विष्णु के निर्देशों का पालन करते हुए असुरों के साथ संधि करके क्षीर सागर से अमृत निकालने के प्रयास में लग गए.

समुद्र मंथन से अमृत कलश निकला तो देवताओं के इशारे पर इंद्र के पुत्र जयंत उसे लेकर अदृश्य हो गए. गुरु शंकराचार्य के कहने पर दैत्यों ने जयंत का पीछा किया और काफी परिश्रम के बाद उन्हें पकड़ लिया. फिर अमृत कलश पर कब्जा प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों में 12 दिन तक युद्ध चला रहा. कहा जाता है कि इस युद्ध के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें गिरी थीं. ये चार स्थान हैं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक. इसीलिए इन्हीं चार जगहों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है. मान्यता है कि देवलोक के 12 दिन, पृथ्वी के 12 साल के बराबर होते हैं. इसलिए हर 12 वर्ष में एक बार इन चारों स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता है.

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