इस बार ऋषि पंचमी का पवित्र त्योहार 28 अगस्त यानी आज मनाया जाएगा. हर साल यह व्रत भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी को रखा जाता है. इस दिन जो लोग व्रत करते हैं और सप्त ऋषियों की पूजा करते हैं, उन्हें अपने सारे पापों से मुक्त होने का वरदान मिलता है. यह व्रत पुरुष और महिलाएं दोनों रख सकते हैं. माना जाता है कि जो भी अपनी गलतियों और पापों से छुटकारा पाना चाहता है, वह इस व्रत को आसानी से कर सकता है.
ऋषि पंचमी व्रत महिलाओं के लिए बहुत अहम होता है, यह व्रत करने से उन्हें उन पापों से मुक्ति मिलती है, जो जाने-अनजाने में मासिक धर्म के दौरान हो जाते हैं. साथ ही सप्तऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है. आज ऋषि पंचमी व्रत रखा जा रहा है और इस दिन सप्तऋषियों की पूजा की जाती है. ऋषि पंचमी व्रत की पूजा में कथा जरूर पढ़ें, तभी इस व्रत का पूरा फल मिलता है.
ऋषि पंचमी का महत्व: सनातन धर्म में ऋषि पंचमी का व्रत सप्तऋषियों की पूजा करने के लिए हर साल मनाया जाता है. कई जगहों पर ऐसा माना जाता है ऋषि पंचमी का व्रत संतान के सुख, वैवाहिक जीवन की खुशहाली और घर में समृद्धि के लिए महिलाएं खासतौर पर करती हैं. सप्त ऋषियों की पूजा करके वे उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं.
कहा जाता है कि जो लोग ऋषि पंचमी का व्रत करते हैं, उनके पिछले जन्म के जो भी पाप हैं, वे सब नष्ट हो जाते हैं. साथ ही इस जन्म में उन्हें अच्छे पुण्य मिलते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है. इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है.
ऋषि पंचमी का शुभ मुहूर्त: इस बार ऋषि पंचमी की पंचमी तिथि 27 अगस्त यानी कल दोपहर 3 बजकर 44 मिनट से शुरू हो चुकी है और तिथि का समापन 28 अगस्त यानी आज शाम 5 बजकर 56 मिनट पर होगा. आज पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 5 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 28 मिनट तक रहेगा और इस समय में पूजन करने से विशेष फल भी प्राप्त होगा.
ऋषि पंचमी क्या रहेगी पूजन विधि: सुबह उठकर साफ-सफाई करके स्नान कर लें और व्रत का संकल्प लें. अपने घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और देवी-देवताओं को उचित स्थान दें. फिर गंगाजल लेकर सप्त ऋषियों की तस्वीर लें, उन्हें स्नान कराएं और पूजन करें. तिलक लगाएं, अक्षत और पुष्प अर्पित करें, फल और मिठाई भी उनकी भोग लगाएं. इसके बाद ऋषि पंचमी की कथा सुनें, आरती करें और सब पापों से मुक्ति के लिए प्रार्थना करें.
ऋषि पंचमी व्रत की कथा: सतयुग में विदर्भ नगरी में श्येनजित नामक राजा हुए थे. वह ऋषियों के समान थे. उन्हीं के राज में एक कृषक सुमित्र था. उसकी पत्नी जयश्री अत्यंत पतिव्रता थी. एक समय वर्षा ऋतु में जब उसकी पत्नी खेती के कामों में लगी हुई थी, तो वह रजस्वला हो गई. उसको रजस्वला होने का पता लग गया फिर भी वह घर के कामों में लगी रही. कुछ समय बाद वह दोनों स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी आयु भोगकर मृत्यु को प्राप्त हुए. जयश्री तो कुतिया बनीं और सुमित्र को रजस्वला स्त्री के सम्पर्क में आने के कारण बैल की योनी मिली, क्योंकि ऋतु दोष के अतिरिक्त इन दोनों का कोई अपराध नहीं था. इसी कारण इन दोनों को अपने पूर्व जन्म का समस्त विवरण याद रहा. वे दोनों कुतिया और बैल के रूप में उसी नगर में अपने बेटे सुचित्र के यहां रहने लगे. धर्मात्मा सुचित्र अपने अतिथियों का पूर्ण सत्कार करता था. अपने पिता के श्राद्ध के दिन उसने अपने घर ब्राह्मणों को भोजन के लिए नाना प्रकार के भोजन बनवाए.
जब उसकी स्त्री किसी काम के लिए रसोई से बाहर गई हुई थी तो एक सर्प ने रसोई की खीर के बर्तन में विष वमन कर दिया. कुतिया के रूप में सुचित्र की मां कुछ दूर से सब देख रही थी. पुत्र की बहू के आने पर उसने पुत्र को ब्रह्म हत्या के पाप से बचाने के लिए उस बर्तन में मुंह डाल दिया. सुचित्र की पत्नी चन्द्रवती से कुतिया का यह कृत्य देखा न गया और उसने चूल्हे में से जलती लकड़ी निकाल कर कुतिया को मारी. बेचारी कुतिया मार खाकर इधर-उधर भागने लगी. चौके में जो झूठन आदि बची रहती थी, वह सब सुचित्र की बहू उस कुतिया को डाल देती थी, लेकिन क्रोध के कारण उसने वह भी बाहर फिकवा दी. सब खाने का सामान फिकवा कर बर्तन साफ करके दोबारा खाना बना कर ब्राह्मणों को खिलाया.
रात्रि के समय भूख से व्याकुल होकर वह कुतिया बैल के रूप में रह रहे अपने पूर्व पति के पास आकर बोली, हे स्वामी! आज तो मैं भूख से मरी जा रही हूं. वैसे तो मेरा पुत्र मुझे रोज खाने को देता था, लेकिन आज मुझे कुछ नहीं मिला. सांप के विष वाले खीर के बर्तन को अनेक ब्रह्म हत्या के भय से छूकर उनके न खाने योग्य कर दिया था. इसी कारण उसकी बहू ने मुझे मारा और खाने को कुछ भी नहीं दिया. तब वह बैल बोला, हे भद्रे! तेरे पापों के कारण तो मैं भी इस योनी में आ पड़ा हूं और आज बोझा ढ़ोते-ढ़ोते मेरी कमर टूट गई है. आज मैं भी खेत में दिनभर हल में जुता रहा. मेरे पुत्र ने आज मुझे भी भोजन नहीं दिया और मुझे मारा भी बहुत. मुझे इस प्रकार कष्ट देकर उसने इस श्राद्ध को निष्फल कर दिया.
अपने माता-पिता की इन बातों को सुचित्र सुन रहा था, उसने उसी समय दोनों को भरपेट भोजन कराया और फिर उनके दुख से दुखी होकर वन की ओर चला गया. वन में जाकर ऋषियों से पूछा कि मेरे माता-पिता किन कर्मों के कारण इन नीची योनियों को प्राप्त हुए हैं और अब किस प्रकार से इनको छुटकारा मिल सकता है. तब सर्वतमा ऋषि बोले तुम इनकी मुक्ति के लिए पत्नीसहित ऋषि पंचमी का व्रत धारण करो तथा उसका फल अपने माता-पिता को दो. भाद्रपद महीने की शुक्ल पंचमी को मुख शुद्ध करके मध्याह्न में नदी के पवित्र जल में स्नान करना और नए रेशमी कपड़े पहनकर अरूधन्ती सहित सप्तऋषियों का पूजन करना.
इतना सुनकर सुचित्र अपने घर लौट आया और अपनी पत्नीसहित विधि-विधान से पूजन व्रत किया. उसके पुण्य से माता-पिता दोनों पशु योनियों से छूट गए. इसलिए जो महिला श्रद्धापूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत करती है, वह समस्त सांसारिक सुखों को भोग कर बैकुंठ को जाती है.
















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