Jaya Ekadashi Vrat Katha : जया एकादशी को इतना अहम माना गया है कि इसे करने से व्यक्ति पिशाच योनि में जाने से बच जाता है. साथ यह व्रत रखने से ब्रह्म हत्या का पाप भी खत्म हो जाता है. धर्म-शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु को यह व्रत बहुत प्रिय है. हर साल माघ शुक्ल एकादशी को जया एकादशी व्रत रखा जाता है. इस दिन चावल खाना निषेध होता है. साथ ही बाल भी नहीं धोने चाहिए. आज 29 जनवरी 2026, गुरुवार को जया एकादशी है. गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को समर्पित है. ऐसे में यह एकादशी व्रत रखने से दोगुना फल मिलेगा. लेकिन ध्यान रखें कि एकादशी की पूजा में जया एकादशी की व्रत कथा जरूर पढ़ें.
शास्त्रों में इसे चौबीस एकादशियों में विशेष स्थान प्राप्त है. मान्यता है कि इस दिन व्रत, जप, तप और दान करने से व्यक्ति को जय, विजय, सुख, समृद्धि और ग्रह शांति का आशीर्वाद मिलता है. जया एकादशी नाम का ही अर्थ है- हर क्षेत्र में विजय. कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं और उनके जीवन के कष्ट दूर करते हैं.
शुभ मुहूर्त: द्रिक पंचांग के अनुसार, जया एकादशी की तिथि 28 जनवरी यानी कल शाम 4 बजकर 35 मिनट पर शुरू हो चुकी है और तिथि का समापन 29 जनवरी यानी आज दोपहर 1 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी.
पूजन विधि: जया एकादशी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें. पूजा स्थान पर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की तस्वीर स्थापित करें. दीपक जलाकर जल या पंचामृत से अभिषेक करें और तुलसी, फूल व चंदन अर्पित करें. भोग में फल रखें, अन्न का सेवन न करें. ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें. दिनभर फलाहार या निर्जल व्रत रखें. शाम को फिर पूजा कर व्रत कथा सुनें और अगले दिन द्वादशी में व्रत खोलें.
जया एकादशी महत्व: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जया एकादशी पर भगवान श्रीकृष्ण की उपासना करने से पाप कर्मों का नाश होता है. श्रीकृष्ण प्रेम के अवतार हैं और उनका नाम जप व्यक्ति के मन को शुद्ध और प्रेममय बना देता है. मान्यता है कि इस दिन नियमपूर्वक व्रत करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी मिलकर नौ ग्रहों को अनुकूल करते हैं. इससे जीवन में सुख-शांति, धन-समृद्धि और मानसिक संतुलन बढ़ता है.
करें इन मंत्रों का जाप
जया एकादशी के दिन ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ जरूर करें.
जया एकादशी व्रत कथा: अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न करते है कि हे भगवान ! अब कृपा कर आप मुझे माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्त्व है विस्तारपूर्वक बताएं. माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी में किस देवता की पूजा करनी चाहिए तथा इस एकादशी व्रत की कथा क्या है ? उसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है शीघ्र ही बताएं?
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं. भगवान कृष्ण ने कहा है कि यह तिथि पापों को हरने वाली है. इस एकादशी का व्रत करने पर मनुष्यों को कभी प्रेतयोनिमें नहीं जाना पड़ता. इसकी कहानी इस प्रकार है
एक समय की बात है, स्वर्गलोक में देवराज इन्द्र राज्य करते थे. देवगण पारिजात वृक्षों से भरे हुए नंदनवन में एक बार अप्सराओं के साथ घूम रहे थे. नंदन वन में उत्सव का आयोजन हो रहा था. इसमें देवता, ऋषि मुनि सभी मौजूद थे. उस समय गंधर्व गा रहे थे तथा गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थी. इंद्र गंधर्वों के नृत्य का आनंद ले रहे थे. उसमें गन्धर्व गान कर रहे थे, जिनमें पुष्पदन्त, चित्रसेन और उसका पुत्र–ये तीन मुख्य कलाकार थे. चित्रसेन की पत्नी का नाम मालिनी था. मालिनी से एक कन्या उत्पन्न हुई थी, जो पुष्पवन्तीके नाम से विख्यात थी. पुष्पदन्त गन्धर्व के एक पुत्र था, जिसको लोग माल्यवान् कहते थे. माल्यवान् पुष्पवन्ती के रूप पर अत्यन्त मोहित था. ये दोनों भी इन्द्र के लिए नृत्य करने के लिए आए थे. इन दोनों का गान हो रहा था, इनके साथ अप्सराएंभी थीं. परस्पर अनुराग के कारण ये दोनों मोह में बए हए .
एक दूसरे में खोने के कारण वो वे शुद्ध गान न गा सके. कभी ताल भंग हो जाता और कभी गीत बंद हो जाता था. इन्द्र ने इस पर विचार किया और इसमें अपना अपमान समझकर वे क्रोधित हो गए. इंद्र ने दोनों को शाप दिया और कहा कि ओ मूर्खों! तुम दोनों को धिक्कार है! क्योंकि तुमने संगीत जैसी पवित्र साधना का तो अपमान किया ही है साथ ही सभा में उपस्थित गुरुजनों का भी अपमान किया है. इंद्र के शाप के प्रभाव से दोनों पृथिवी पर हिमालय पर्वत के जंगल में पिशाची जीवन व्यतीत करने लगे. एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी पिशाची से कहा कि हमने कौन-सा पाप किया है, जिससे यह पिशाच-योनि प्राप्त हुई है ? नरक का कष्ट अत्यन्त भयंकर है तथा पिशाचयोनि भी बहुत दुःख देनेवाली है . दैवयोग से उन्हें माघ मास की एकादशी तिथि प्राप्त हो गई . उस दिन उन दोनों ने सब प्रकार के आहार त्याग दिए. जलपान तक नहीं किया. किसी जीव की हिंसा नहीं की, यहां तक कि फल भी नहीं खाया. इससे दुखी होकर वो दोनों एक पीपल के पेड़ के पास बैठ गए. सूर्यास्त हो गया . उन्हें नींद नहीं आयी. वे रति या और कोई सुख भी नहीं पा सके. सूर्योदय हुआ. द्वादशी का दिन आया. उन पिशाचों के द्वारा जया के उत्तम व्रत का पालन हो गया. उन्होंने रातमें जागरण भी किया था.
उस व्रत के प्रभाव से उन दोनों की पिशाचता दूर हो गई. पुष्पवत्ती ओर माल्यवान् अपने पूर्वरूप में आ गए. वे दोनों मनोहर रूप धारण करके विमान पर बैठे ओर स्वर्गलोक में चले गए. वहां देवराज इन्द्र के सामने जाकर दोनों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उन्हें प्रणाम किया.
माल्यवान् बताया कि भगवान वासुदेव की कृपा और जया एकादशी व्रत से हमारी पिशाचता दूर हुई है. इन्द्र ने कहा कि तो अब तुम दोनों मेरे कहने से सुधापान करो. जो लोग एकादशीके व्रत में तत्पर और भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत होते हैं, वे हमारे भी पूजनीय हैं. भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसलिए सभी का एकादशी का व्रत करना चाहिए. यह एकादशी ब्रह्महत्या का पाप भी दूर करने वाली है. इस माहात्म्यके पढ़ने ओर सुननेसे अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है. इस प्रकार एकादशी व्रत करने से सभी का जीवन उत्तम हो.
















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