पापांकुशा एकादशी आज 3 अक्टूबर को है. 3 अक्टूबर को यह बेहद महत्वपूर्ण मानी गई एकादशी का व्रत रखा जाएगा और 4 अक्टूबर को एकादशी व्रत का पारण होगा. एकादशी व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. पापांकुशा एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा करें और इस व्रत की कथा पढ़ें. यहां है पापांकुशा एकादशी व्रत की संपूर्ण कथा –
सनातन परंपरा में भगवान श्री विष्णु के लिए रखे जाने वाले एकादशी व्रत की बड़ी महत्ता मानी गई है. हिंदू मान्यता के अनुसार इस व्रत का महत्व तब और भी ज्यादा बढ़ जाता है जब यह दशहरे के बाद आश्विन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि पर पड़ता है और पापांकुशा एकादशी व्रत कहलाता है. मान्यता है कि श्रद्धा भाव और विधि-विधान इस दिन भगवान विष्णु का पूजन और व्रत को करने से व्यक्ति के जीवन से जुड़े सारे पाप और दोष दूर हो जाते हैं और वह श्री हरि की कृपा से सभी सुखों को प्राप्त करता हुआ हमेशा खुशहाल बना रहता है. आइए सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाले पापांकुशा एकादशी व्रत की विधि और धार्मिक महत्व के बारे में जानते हैं.
पापांकुशा एकादशी व्रत का शुभ मुहूर्त: पंचांग के अनुसार सभी पापों का नाश करने वाली पापांकुशा एकादशी का व्रत आज 03 अक्टूबर 2025 को रखना उचित रहेगा क्योंकि आश्विन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि 02 अक्टूबर 2025 यानि कल दशहरे के दिन शाम को 07:10 से प्रारंभ होकर आज 03 अक्टूबर 2025 की शाम को 06:32 बजे तक रहेगी. ऐसे में पापांकुशा एकादशी व्रत का पारण कल 04 अक्टूबर 2025 को प्रात:काल 06:16 से लेकर 08:37 के बीच में करना अत्यंत ही शुभ और फलदायी रहेगा.
पापांकुशा एकादशी व्रत की पूजा विधि ; सभी पापों का नाश करने वाली पापांकुशा एकादशी व्रत को करने के लिए साधक को प्रात:काल स्नान-ध्यान करने के बाद सबसे पहले इस व्रत को विधि-विधान से करने का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद अपने पूजा घर में या फिर ईशान कोण में श्री हरि के चित्र या मूर्ति को पीले रंग के आसन पर रख कर उन पर पवित्र जल छिड़कें. इसके बाद उनके सामने सबसे पहले दीपक जलाएं और उसके बाद पुष्प, चंदन, धूप, भोग आदि अर्पित करें.
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा: ” प्राचीन समय की बात है विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था. वह सभी पाप और अधर्म वाले कर्म करता था. वह बड़ा ही क्रूर और निर्दयी था. वह अपने पूरे जीवन में दूसरे जीवों को दुख देता रहा. जीवन के अंत में उसके पास यमराज के दूत आए और बोला कि कल तुम्हारा अंतिम दिन है. कल वे प्राण हर लेंगे और अपने साथ यमलोक ले जाएंगे.
यमदूतों की बातें सुनकर बहेलिया डर गया. वह सोचने लगा कि उसे कर्मों के आधार पर नरक के कष्ट भोगने होंगे. अनेक प्रकार की यातनाएं सहन करनी होंगी. इस डर से वह वन में गया और अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंच गया. अंगिरा ऋषि को प्रणाम करके अपनी चिंता और दुख को बताया. उसने कहा कि हे मुनि! मैंने पूरे जीवन पाप कर्म किए हैं. अब उससे मुक्ति चाहता हूं. कुछ ऐसा उपाय बताएं, ताकि उससे मुक्ति मिल जाए और मोक्ष प्राप्त कर लूं.
तब अंगिरा ऋषि ने कहा कि तुमको पापांकुशा एकादशी का व्रत करना चाहिए. इस व्रत को करने से पापों से मुक्ति मिल सकती है. श्रीहरि की कृपा से मोक्ष के भी अधिकारी हो जाओगे. पापांकुशा एकादशी व्रत विधि और महत्व को सुनकर बहेलिया खुश हो गया. उसने अंगिरा ऋषि को धन्यवाद किया और घर चला गया.
उसने अश्विन शुक्ल एकादशी को पापांकुशा एकादशी का व्रत विधि विधान से रखा. भगवान पद्मनाभ की पूजा की और रात्रि में जागरण किया. उसके अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया और व्रत पूरा किया. पापांकुशा एकादशी के व्रत से उसके सभी पाप मिट गए. मृत्यु के बाद उसे मोक्ष मिल गया. जो व्यक्ति यह व्रत करता है, उसे भी मोक्ष की प्राप्ति होती है.”
भगवान विष्णु को भोग के साथ उनकी प्रिय चीज तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं. इसके बाद पापांकुशा एकादशी व्रत की कथा को पढ़े या फिर किसी के द्वारा कहे जाने पर श्रद्धापूर्वक सुनें. व्रत की कथा को सुनने के बाद श्री हरि के मंत्र का जप करें और पूजा के अंत में उनकी आरती करना बिल्कुल न भूलें. पूजा पूर्ण होने के बाद सभी को प्रसाद बांटे और स्वयं भी ग्रहण करें. ध्यान रहे यह व्रत बगैर पारण के नहीं पूर्ण होता है, इसलिए दूसरे दिन शुभ मुहूर्त में इस व्रत का विधि-विधान से पारण करें.
















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