शरद पूर्णिमा आज, जानें चांद की चाँदनी में खीर रखने का मुहूर्त, पूजा में पढ़ें यह कथा

Spread the love

आज शरद पूर्णिमा है. अश्विन शुक्‍ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं. इस दिन 16 कलाओं से परिपूर्ण चांद अमृत वर्षा करते हैं, जिसका अमृतपान करने के लिए लोग चांद की रोशनी में खीर रखते हैं. साथ ही शरद पूर्णिमा के दिन व्रत भी रखा जाता है और चंद्र देव के साथ मां लक्ष्‍मी की भी पूजा की जाती है. मान्यता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था इसलिए वह इस दिन धरती पर भ्रमण करती है. शरद पूर्णिमा व्रत करने से मां लक्ष्मी के साथ श्री विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शरद ऋतु की पूर्णिमा काफी महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है और इसी तिथि से शरद ऋतु का आरंभ भी होता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रेम और कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण श्रीकृष्ण ने इसी दिन महारास रचाया था. इस दिन विशेष प्रयोग करके अच्छे स्वास्थ्य, प्रेम और धन का वरदान पाया जा सकता है. 

ज्योतिषियों के मुताबिक, इस बार शरद पूर्णिमा पर कई सारे शुभ संयोगों का निर्माण होने वाला है, साथ ही इस दिन अशुभ पंचक का साया भी रहेगा. तो ऐसे में जानते हैं कि क्या पंचक का प्रभाव पूर्णिमा पर दिखेगा और कल किस मुहूर्त में मां लक्ष्मी की पूजा करनी होगी और खीर चंद्रमा में रोशनी में रखनी होगी.

शरद पूर्णिमा की तिथि: शरद पूर्णिमा की पूर्णिमा तिथि 6 अक्टूबर यानी आज दोपहर 12 बजकर 23 मिनट से शुरू होगी और तिथि का समापन 7 अक्टूबर की सुबह 9 बजकर 16 मिनट पर होगा. तो उदयातिथि के मुताबिक, शरद पूर्णिमा 6 सितंबर यानी आज ही मनाई जा रही है. 

शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने का मुहूर्त: पंचांग के अनुसार, खीर रखने का मुहूर्त 6 अक्टूबर यानी आज रात 10 बजकर 37 मिनट से शुरू होकर रात 12 बजकर 09 मिनट तक रहेगा, जो कि सबसे शुभ और लाभकारी मुहूर्त माना जा रहा है.  

क्या पूर्णिमा पर रहेगा पंचक का साया? शरद पूर्णिमा पर पंचक का साया भी रहने वाला है. दरअसल, पंचक की शुरुआत दशहरे के अगले दिन से हो गई थी, जो कि तिथि के अनुसार 3 अक्टूबर से लेकर 8 अक्टूबर तक रहेंगे. इस पंचक का प्रभाव आज पूर्णिमा पर भी देखने को मिलेगा इसलिए इस दौरान कोई शुभ काम न करें.  

शरद पूर्णिमा पर करें मां लक्ष्मी की पूजा: शरद पूर्णिमा की रात को एक विशेष पूजा करें. इस दिन माता लक्ष्मी के समक्ष एक दीपक प्रज्वलित करें और उन्हें सुगंधित फूल, विशेष कर गुलाब अर्पित करें. इसके बाद इंद्र कृत लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करें और माता लक्ष्मी से धन-संपन्नता की प्रार्थना करें. 

इसके अलावा, शरद पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि करके व्रत का संकल्प लें. उसके बाद सभी देवी-देवताओ का स्मरण करें. फिर, उन्हें वस्त्र, अक्षत, आसन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, सुपारी व दक्षिणा आदि अर्पित करें. फिर, संध्याकाल में दूध की खीर बनाकर अर्धरात्रि में भगवान को भोग लगाएं. उसके बाद चंद्रमा की पूजा करें और खीर का नेवैद्य अर्पित करें. खीर को चंद्रमा की चांदनी में रखें और अगले दिन सुबह प्रसाद के रूप में बांटें.

शरद पूर्णिमा की कथा: शरद पूर्णिमा के व्रत में भगवान विष्‍णु और मां लक्ष्‍मी की पूजा करें, साथ ही व्रत कथा जरूर पढ़ना चाहिए. शरद पूर्णिमा की व्रत कथा के अनुसार, ”एक व्यापारी की दो बेटियां थीं. उसकी दो सुंदर और सुशील बेटियां थीं. दोनों बहनें धार्मिक स्वभाव की थी, लेकिन बड़ी वाली बेटी धार्मिक रीति-रिवाजों में बहुत आगे थी. दोनों रोज भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करती थीं और पूर्णिमा का उपवास भी रखती थीं. ईश्वर का आशीर्वाद ही था कि दोनों बहनें अच्छे परिवारों में ब्याही गईं. 

शादी के बाद भी दोनों ने पूर्णिमा की व्रत जारी रखा, लेकिन छोटी बेटी के व्रत पूरा नहीं रखती थी और संध्याकाल में भोजन कर लेती थी. जिसकी वजह से उसे पूरी तरह से व्रत का पुण्य फल नहीं मिल पाता था. बड़ी बेटी ने अपनी पूरी श्रद्धा से व्रत पूर्ण किया, जिससे उसे पुत्र की प्राप्ति हुई. हालांकि, नियम से पूर्णिमा के व्रत करने के कारण छोटी बेटी ने भी संतान की सुख पाया, लेकिन उसकी संतान दीर्घायु नहीं होती थी और जन्म लेने के कुछ दिन बाद उसकी संतान की मृत्यु हो जाया करती थी. 

अपने इस दुख का कारण जानने के लिए उसने एक महात्मा से बात की. महात्मा ने उसे बताया तुम्हारा मन पूरी तरह से ईश्वर भक्ति में नहीं लगता है, जिसके कारण तुम्हें तकलीफ भोगनी पड़ रही है. इस दुख का निवारण पूछने पर महात्मा ने उसे शरद पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि विधान के साथ करने के लिए कहा. महात्मा की बात सुनकर छोटी बहन ने पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान के साथ पूरा किया, लेकिन उसकी संतान जीवित नहीं बची. जब वह पुत्र को खोने का संताप कर रही थी, तभी उसकी बड़ी बहन आई. 

मौसी के वस्त्र छूने ने छोटी बहन की संतान जीवित हो उठी.  यह देख छोटी बहन खुश हुई और खुशी से रोने लगी, तब बड़ी बहन ने उसे व्रत की महिमा बताई. इसके बाद छोटी बहन ने पूरे विधि-विधान के साथ शरद पूर्णिमा का व्रत किया और दूसरों को भी व्रत करने की सलाह दी. मान्यता है कि शरद पूर्णिमा का व्रत करने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है. इससे आपको सभी कार्यों में सफलता हासिल होती है.” 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *