30 नवंबर या 1 दिसंबर, कब है मोक्षदा एकादशी? जानें किस मुहूर्त में होगा श्रीहरि का पूजन

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एक आध्यात्मिक साधक और ज्योतिष मार्गदर्शक के रूप में यह समझना आवश्यक है कि एकादशी व्रत का शास्त्रों में अत्यंत महत्व बताया गया है. विष्णु पुराण और वेदों में एकादशी को देवताओं की रक्षक तिथि कहा गया है, जो मनुष्यों को पापों से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करती है. एकादशी केवल उपवास का नाम नहीं है, बल्कि मन, वाणी और कर्म को शुद्ध करने की साधना है. मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे मोक्षदा एकादशी कहा गया है, विशेष रूप से मोक्ष प्रदान करने वाली तिथि मानी जाती है. इस बार मोक्षदा एकादशी का व्रत 1 दिसंबर को रखा जाएगा. 

शुभ मुहूर्त: द्रिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष मोक्षदा एकादशी की तिथि 30 नवंबर को शाम 4 बजकर 30 मिनट से शुरू होकर 1 दिसंबर को दोपहर 2 बजकर 20 मिनट तक रहेगी. इस पावन दिन पर रेवती नक्षत्र, व्यतिपात योग और करण ‘बव’ का अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है. शास्त्रों में कहा गया है कि यह योग सत्कर्मों के फल को सहस्रगुना बढ़ा देता है. 

महत्व: पद्म पुराण के अनुसार, मोक्षदा एकादशी का व्रत, प्रभु भजन, दान और पूजा करने से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है. यही नहीं, एकादशी को पितृमोचन का माध्यम भी माना गया है. इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए किया गया श्राद्ध और दान अत्यंत शुभ माना जाता है. इसी दिन कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दिया था. 

मोक्षदा एकादशी वैष्णव भक्तों के लिए वर्ष का सर्वोच्च पर्व माना गया है. मान्यता है कि इस दिन बैकुंठ के स्वर्ण द्वार खुलते हैं और एकादशी व्रत करने वाला भक्त विष्णुधाम में प्रवेश का अधिकारी बनता है. पद्म पुराण में वर्णित है कि इस एकादशी का पालन करने से सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में भक्ति, आनंद और मोक्ष का संगम होता है.

पूजन विधि: मोक्षदा एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करें. उसके बाद भगवान विष्णु की पंचोपचार पूजा- गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा करें. तुलसी पत्र अवश्य अर्पित करें. दिनभर फलाहार या निर्जला व्रत करें. विष्णु सहस्रनाम, मंत्र-जप और भजन-कीर्तन. उसके बाद द्वादशी के दिन पारण कर प्रभु का आभार व्यक्त करें. 

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