दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि को अन्नकूट और गोवर्धन की पूजा की जाती है. मुख्यतः, ये प्रकृति की पूजा है जिसका आरंभ भगवान कृष्ण ने किया था. इस दिन प्रकृति के आधार के रूप में गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है और समाज के आधार के रूप में गाय की पूजा की जाती है. ये पूजा ब्रज से आरंभ हुई थी और धीरे धीरे भारत में प्रचलित हो गई.
इसके पीछे की कथा आती है की इंद्र की पूजा ना करके भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाई. और जब ब्रज जलमग्न हो गया तो भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठा कर के ब्रजवासियों की रक्षा की थी. इस बार अन्नकूट और गोवर्धन पूजा 2 नवंबर, शनिवार को की जाएगी.
गोवर्धन पूजा और गोवर्धन परिक्रमा का महत्व
गोवर्धन पूजा लीलाधर भगवान श्री कृष्ण की एक लीला का ही हिस्सा है. पूजन के समय स्वयं भगवान ने विशाल रूप धारण करके स्वयं को गोवर्धन घोषित किया. शास्त्र कहते हैं कि जो भक्त गिरिराज जी महाराज के दर्शन करता है और गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करता है, उसे कई तीर्थों और तप करने से भी हजारों गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है. गोवर्धन परिक्रमा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि इसे मनोकामनाओं की पूर्ति का एक महत्वपूर्ण साधन भी माना जाता है. भक्तों का विश्वास है कि जब वे श्रद्धा और भक्ति के साथ गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं, तो भगवान श्री कृष्ण उनकी सभी इच्छाएं सुनते हैं और उन्हें पूरा करते हैं.
गोवर्धन पूजा शुभ मुहूर्त
गोवर्धन पूजा की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 1 नवबंर यानी आज शाम को 6 बजकर 16 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 2 नवंबर यानी कल रात 8 बजकर 21 मिनट पर होगा. उदयातिथि के अनुसार, इस बार गोवर्धन और अन्नकूट का त्योहार 2 नवंबर को ही मनाया जाएगा.
गोवर्धन पूजन के लिए ये मुहूर्त रहेंगे
– एक मुहूर्त सुबह 6 बजकर 34 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 46 मिनट तक रहेगा.
– दूसरा मुहूर्त दोपहर 3 बजकर 23 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 35 मिनट तक रहेगा.
– तीसरा मुहूर्त शाम 5 बजकर 35 मिनट से लेकर 6 बजकर 01 मिनट तक रहेगा.
गोवर्धन पूजन विधि
इस दिन सबसे पहले शरीर पर तेल की मालिश करके स्नान करें. इसके बाद घर के मुख्य द्वार पर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएं. साथ ही उस पर्वत को घेरकर आसपास ग्वालपाल, पेड़ और पौधों की आकृति बनाएं. उसके बाद गोवर्धन के पर्वत के बीचोंबीच भगवान कृष्ण की मूर्ति या तस्वीर लगाएं. इसके बाद गोवर्धन पर्वत और भगवान कृष्ण की पूजा करें. पूजन करने के बाद अपनी मनोकामनाओं की प्रार्थना करें. इसके बाद भगवान कृष्ण को पंचामृत और पकवान का भोग लगाएं. ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो लोग गोवर्धन पर्वत की प्रार्थना करते हैं, उन लोगों की संतान से संबंधित समस्याएं समाप्त हो जाती हैं.
गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट की मान्यता
इस दिन श्रद्धालु तरह-तरह की मिठाइयों और पकवानों से भगवान कृष्ण को भोग लगाते हैं. यही नहीं, इस दिन 56 भोग बनाकर भगवान कृष्ण को अर्पित किये जाते हैं और इन्हीं 56 तरह के पकवानों को अन्नकूट बोला जाता है. इस दिन मंदिरों में भी अन्नकूट का आयोजन किया जाता है.
छप्पन भोग का नैवेद्य चढ़ाना होता है जरूरी
गोवर्धन पर्व के दिन गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पूजन किया जाता है साथ ही गौ माता की भी पूजा की जाती है. गोवर्धन पूजन के बाद भक्त भांति-भांति के पकवान बनाकर गोवर्धन पर्वत एवं भगवान श्री कृष्ण को छप्पन भोग का नैवेद्य चढ़ाते हैं, बाद में इन छप्पन भोग को मिलाकर जो प्रसाद तैयार किया जाता है, उसे अन्नकूट कहा जाता है.
गोवर्धन पूजा की कथा
द्वापर युग में ब्रज के रहने वाले देवराज इंद्र की छप्पन भोगों से पूजा किया करते थे. तब श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत और गाय का महत्व बताते हुए कहा कि हमारी असली संपत्ति गाय और गोवर्धन पर्वत है, इन्हीं से हमारा जीवन चलता है, इसलिए इंद्र की पूजा के स्थान पर हमें उनकी पूजा करनी चाहिए. इंद्र इसे अपना अपमान समझकर क्रोधित हो गए और ब्रज में मूसलाधार वर्षा करनी शुरू कर दी, जब पूरा ब्रज पानी से डूबने लगा तब ब्रजवासी व्याकुल होकर श्री कृष्ण के पास पहुंचे और बोले कि अब तुम्ही बताओ हम क्या करें, कैसे बचें.
इस पर श्री कृष्ण ने अपने हाथ की सबसे छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को धारण किया और सभी ब्रजवासियों को उसके नीचे आने के लिए कहा. ऐसा करके श्री कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप और अतिवृष्टि से होने वाली जन धन की हानि को भी रोकने का काम किया. इंद्र ने इसके बाद भी वर्षा जारी रखी किंतु जब देखा कि किसी का कोई नुकसान नहीं हो रहा है क्योंकि सभी ने श्री कृष्ण की शरण ले रखी है तो उनका अभिमान भी चूर चूर हो गया. इंद्र ने भी आकर श्री कृष्ण की शरण ली और अपनी गलती मानी और पूरे गांव में श्री कृष्ण का गुणगान किया. इस पर पूरे ब्रज में उत्सव मनाया गया.
गाय दुहना है निषिद्ध
गोवर्धन पूजन के दिन गायों को दुहना निषिद्ध माना जाता है. इस अवसर पर गाय, बैल इत्यादि पशुओं को स्नान कराके, उनके पैर धोकर फूल, मालाओं और आभूषणों इत्यादि से सजाकर उनकी पूजा की जाती है.
गोवर्धन पूजा से मिलती है यह सीख
वास्तव में भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पूजा कर यह संदेश दिया कि अहंकार और दुराचार के अंत के लिए सबको मिलकर प्रयास करना होगा.
















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