तृपक्ष चल रहा है. इस साल पितृपक्ष 7 सिंतबर से शुरू हुआ था और 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगा. शास्त्रों में श्राद्ध के दो अलग-अलग प्रकार बताए गए हैं. पहला हर वर्ष व्यक्ति की मृत्यु तिथि पर किया जाने वाला श्राद्ध और दूसरा पितृ पक्ष में किया जाने वाला श्राद्ध. पितृपक्ष में किए जाने वाले श्राद्धों में महाभरणी श्राद्ध खास अहमियत रखता है. भरणी श्राद्ध पितृ पक्ष के सबसे शुभ दिनों में से एक है. हर साल यह अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आता है. इस दौरान वंशज अपने मृत पूर्वजों की आत्मा की शांति और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अनुष्ठान करते हैं. इस बार महाभरणी श्राद्ध 11 सितंबर को पंचमी तिथि पर पड़ रहा है.
पितृपक्ष में जब किसी तिथि पर अपराह्न काल यानी दोपहर के समय भरणी नक्षत्र होता है, तब इसे महाभरणी श्राद्ध कहा जाता है. भरणी नक्षत्र चतुर्थी या पंचमी तिथि को विशेष फलदायी माना जाता है. हालांकि इस तिथि पर श्राद्ध की विधि वैसी ही रहती है जैसे आप अन्य तिथियों पर श्राद्ध करते हैं.
बोधगया में पिंडदान करने जितना पुण्यकारी: महाभरणी श्राद्ध को करने से व्यक्ति को बोधगया में पिंडदान करने जितना फल मिलता है. ऐसी मान्यता है कि यदि मृत व्यक्ति ने अपने जीवन काल में कोई तीर्थ यात्रा नहीं की है, तब इस श्राद्ध को करने से मृत व्यक्ति को गया में श्राद्ध करने जितना पुण्य मिलता है. यह श्राद्ध व्यक्ति को पितृ दोष और काल सर्प दोष से भी मुक्ति दिलाता है.
बता दें कि महाभरणी नक्षत्र के देवता यम हैं. इसलिए भरणी नक्षत्र में किए गए श्राद्ध से यमराज प्रसन्न होते हैं. भरणी नक्षत्र में यम का व्रत औरऱ पूजन विशेष फलदायी माना गया है. बता दें कि व्यक्ति के मृत्यु के एक साल तक महाभरणी श्राद्ध नहीं किया जाता है. क्योंकि मृत्यु के पहले वर्ष तक वार्षिक श्राद्ध होता है. ऐसी मान्यता है कि एक साल तक उसमें प्रेतत्व का अंश बना रहता है.
भरणी श्राद्ध क्यों किया जाता है? आपको बता दें कि जो लोग कभी जीवन में कोई तीर्थ यात्रा नहीं कर पाते और उनकी मृत्य हो जाती है तो ऐसे लोगों का श्राद्ध मातृ गया, पितृ गया, पुष्कर तीर्थ, बद्रीकेदार जैसे तीर्थों पर किया जाता है ऐसा करने से व्यक्ति को श्राद्ध का शुभ फल मिलता है. आपको बता दें कि यही वजह है इसे भरणी श्राद्ध कहा जाता है. पितृ पक्ष के भरणी नक्षत्र के दिन भरणी श्राद्ध किया जाता है. यह एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है. यह किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद पहले वर्ष में नहीं किया जाता है. हर वर्ष भरणी श्राद्ध करना हमेशा बेहतर होता है. इसे पहले महालया की बजाय दूसरे वर्ष से ही करें. नित्य तर्पण में, मृतक व्यक्ति को पितृत्व का अधिकार मिलने के बाद ही अपना नाम उच्चारण करना चाहिए. इसे पहले वर्ष में न करें. हालाँकि, कुछ पुरोहितों के मतानुसार, सपिंडकरण और षोडशमिक श्राद्ध जैसी सभी विधियों की तरह भरणी श्राद्ध भी किया जा सकता है.
भरणी श्राद्ध का महत्व: भरणी नक्षत्र मृत्यु के देवता यम द्वारा शासित है. इसलिए महाभरणी श्राद्ध के दौरान चतुर्थी या पंचमी तिथि को श्राद्ध कर्म करने का विशेष महत्व है. महालया अमावस्या के बाद, पितृ पक्ष के दौरान भरणी नक्षत्र सबसे अधिक मनाया जाने वाला दिन है. ऐसा माना जाता है कि भरणी श्राद्ध फलदायी होता है क्योंकि श्राद्ध कर्म गया में किया जाता है.
भरणी श्राद्ध करने के नियम
➤श्राद्ध हमेशा अपनी ज़मीन या घर पर ही करना चाहिए. किसी तीर्थस्थल या नदी के किनारे भी श्राद्ध किया जा सकता है.
➤श्राद्ध करने के लिए दक्षिण दिशा की ओर ढलान वाली भूमि होनी चाहिए, क्योंकि दक्षिणायन में पितरों का प्रभुत्व होता है. उत्तरायण में देवताओं का प्रभाव होता है.
➤तीर्थस्थल श्राद्ध के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं.
➤श्राद्ध कर्म में श्रद्धा, पवित्रता, शुद्धता और पवित्रता का ध्यान रखना आवश्यक है.
➤श्राद्ध दिन के मध्य में करना चाहिए.
➤श्राद्ध करने का अधिकार केवल पुत्र को ही दिया जाता है। यदि पुत्र न हो, तो पुत्री के पुत्र का पौत्र श्राद्ध कर सकता है. जिन माता-पिता के कई पुत्र हों, उनमें ज्येष्ठ पुत्र को श्राद्ध करने का अधिकार होता है. पुत्र के न होने पर पौत्र श्राद्ध कर सकता है और पौत्र के न होने पर प्रपौत्र श्राद्ध कर सकता है.
➤श्राद्ध कर्म में ब्राह्मण भोजन और तर्पण का बहुत महत्व है.
श्राद्ध में इस मंत्र का जाप करना चाहिए
“ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य इव च
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः”
















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