मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही: ऐसे दें सूर्य देव को अर्घ्य, राशि अनुसार करें दान

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सनातन धर्म में मकर संक्रांति पर्व का बहुत महत्व है. सूर्य देव धनु राशि से निकलेंगे और मकर राशि में गोचर कर जाएंगे जिससे मकर संक्राति होगी. इस दिन से ‘उत्तरायण’ शुरू हो जाएगा. इस पर्व पर स्नान दान का बहुत महत्व है. साथ ही इस तिथि पर सूर्यदेव को सही तरीके से अर्घ्य दें को पुण्य की प्राप्ति होती है , मान-सम्मान में वृद्धि होती है और शरीर स्वस्थ रहेगा.

इस बार मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी और इस दिन सूर्य मकर राशि में दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर प्रवेश करेंगे. मकर संक्रांति के दिन पुण्यकाल में स्नान-दान और ध्यान करना सबसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है. आइए अब जानते हैं कि साल 2026 की मकर संक्रांति के दिन पुण्य काल और महापुण्य काल क्या रहने वाला है.

मकर संक्रांति पर पुण्य काल 14 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से शुरू होने वाला है और महापुण्य काल भी दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से शुरू होकर शाम 4 बजकर 58 मिनट तक रहेगा. इस दिन गंगा स्नान सुबह 9 बजकर 03 मिनट से लेकर सुबह 10 बजकर 48 मिनट तक रहने वाला है.

मकर संक्रांति पूजन विधि: मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें. यदि यह संभव न हो, तो स्नान के जल में गंगाजल मिलाएं. सूर्यदेव की पूजा कर उन्हें अर्घ्य दें. अर्घ्य के जल में रोली, चावल और लाल पुष्प डालें. इस दिन तिल, गुड़, चावल, वस्त्र और कंबल का दान करें. तिल-गुड़ के लड्डू, खिचड़ी और मौसमी व्यंजन बनाकर भगवान को अर्पित करें. इस दिन ‘ऊं घृणि सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप करें. साथ ही, गीता और सूर्य उपासना से जुड़े ग्रंथों का पाठ अवश्य करें.

सूर्य देव को अर्घ्य देने का तरीका: मकर संक्रांति के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें और साफ लाल रंग का कपड़ा पहनें. तांबे के लोटे में शुद्ध जल लें और उसमें लाल फूल, कुमकुम, अक्षत और काला तिल डालें. दोनों हाथों से लोटे को पकड़ें और अपने सिर के ऊपर ले जाएं. धीरे-धीरे जल की धार चढ़ाएं. जल चढ़ते समय जल की धार के बीच से सूर्य देव को देखें. ये किरणें शरीर के लिए अच्छा होता है. अर्घ्य देने के बाद उस जगह तीन बार क्लॉकवाइज परिक्रमा करें. ध्यान रहे कि जल को किसी बर्तन में ही गिराएं.

मकर संक्रांति के अन्य नाम: भारत के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है जैसे- तमिलनाडु में पोंगल, पंजाब में लोहड़ी, गुजरात में उत्तरायण और उत्तर भारत में खिचड़ी या मकर संक्रांति आदि.

मकर संक्रांति पर राशि अनुसार दान

मेष राशि (Aries): मेष राशि वाले गुड़ का दान दें. हर कार्य सफल होगा और कुंडली में कमजोर ग्रह मजबूत होंगे.
वृषभ राशि (Taurus): वृषभ राशि वाले चावल का दान करें. बिजनस में लाभ होगा और जीवन में खुशियां आएगी.
मिथुन राशि (Gemini): मिथुन राशि वाले मूंग की दाल की खिचड़ी दान करें व गाय को चारा खिलाएं. शुभ समाचार प्राप्त होगा.
कर्क राशि (Cancer): कर्क राशि वाले चावल, मिश्री और तिल का दान दें. करियर में सफलता प्राप्त होगी.
सिंह राशि (Leo): सिंह राशि वाले तिल, गुड़, गेहूं, सोना दान दें. अटके काम बनेंगे. जीवन में सुख-शांति आएगी.
कन्या राशि (Virgo): कन्या राशि वाले गाय को हरा चारा खिलाएं, मूंग की दाल की खिचड़ी बनाकर दान करें. ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी.
तुला राशि (Libra): तुला राशि वाले सफेद कपड़ा, चीनी और कंबल दान करें. घर में सुख समृद्धि आएगी.
वृश्चिक राशि (Scorpio): वृश्चिक राशि वाले तिल और गुड़ का दान दें. अचानक धन प्राप्ति हो सकती है और रुके काम बनेंगे.
धनु राशि (Sagittarius): धनु राशि वाले केसर का दान दें. कानूनी मामलों में सफलता मिलेगी और सम्मान बढ़ेगा.
मकर राशि (Capricorn): मकर राशि वाले तेल और तिल का दान करें. विरोधी परास्त होंगे और जीवन में शुभता आएगी.
कुंभ राशि (Aquarius): कुंभ राशि वाले गरीब-अपंगों को भोजन का दान करें. आय के नए स्रोत भी बनेंगे.
मीन राशि (Pisces): मीन राशि वाले रेशमी कपड़ा, तिल, चने की दाल और चावल का दान करें. घर में समृद्धि आएगी.

मकर संक्रांति का महत्व: सनातन धर्म में मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी सहित अन्य पवित्र नदियों, तीर्थों, कुओं और सरोवरों में स्नान का विशेष महत्व है. ऊनी वस्त्र, दुशाला, कंबल, जूते, धार्मिक ग्रंथों और पंचांग का दान करना विशेष पुण्य फलदायी माना गया है. यह पर्व सूर्यदेव की उपासना का दिन है. मान्यता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर यानी मकर राशि में जाते हैं. यह पर्व फसल कटाई से भी जुड़ा है, खासकर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में इसका विशेष महत्व है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर असुरों का संहार कर धर्म की स्थापना की थी. यह भी माना जाता है कि गंगा जी भागीरथ के पीछे-पीछे स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थीं और इस दिन से वे पतित पावनी कहलाई थीं.

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