पद्मिनी एकादशी आज, जानें शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और पारण का समय; पढ़ें व्रत कथा

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आज (27 मई) को पूरे देश में अधिकमास की पद्मिनी एकादशी मनाई जा रही है. जिसको कमला एकादशी और पुण्यवर्धिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, यह व्रत हर 3 साल में एक बार आने वाले अधिकमास (मलमास या पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष में रखा जाता है. इसे सभी व्रतों में अत्यधिक पुण्यदायी और पापों का नाश करने वाला माना गया है. इस दिन श्रीहरि और मां लक्ष्मी की एक साथ पूजा की जाती है. आइए अब जानते हैं कि आज पद्मिनी एकादशी पर पूजन करने के कौन कौन से मुहूर्त रहने वाले हैं.

ज्येष्ठ माह की एकादशी तिथि 26 मई को सुबह 5 बजकर 10 मिनट से शुरू होकर 27 मई को सुबह 6 बजकर 21 मिनट खत्म होगी. इस व्रत का पारण 28 मई को सुबह 5 बजकर 25 मिनट से लेकर सुबह 7 बजकर 56 मिनट तक होगा. 

शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04 बजकर 03 मिनट से लेकर सुबह 4 बजकर 44 मिनट तक.

गोधूलि मुहूर्त- शाम 7 बजकर 10 मिनट से लेकर 7 बजकर 31 मिनट तक.

शुभ योग: पद्मिनी एकादशी पर आज दो योगों का निर्माण होने जा रहा है जिसमें सर्वार्थसिद्धि योग और रवि योग का निर्माण होने जा रहा है. जिसका सुबह 5 बजकर 25 मिनट से शुरू होकर सुबह 5 बजकर 56 मिनट तक रहेगा. 

पूजन विधि: एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना चाहिए. पूजा करने से पहले अपने मंदिर या पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करें. फिर एक लकड़ी के पट्टे पर भगवान विष्णु, बाल गोपाल, शालिग्राम और श्री यंत्र की स्थापना करें. इसके बाद इन सभी को पंचामृत से स्नान कराएं और पीले वस्त्र, फूल और तुलसी की माला अर्पित करें. पूजा के दौरान देसी घी का दीपक जलाएं और धूप भी करें. भगवान को मिठाई, फल, तुलसी के पत्ते और पंचामृत का भोग लगाएं.

इसके बाद विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें. एकादशी के दिन दान-पुण्य करना बहुत शुभ माना जाता है, इसलिए अपनी श्रद्धा के अनुसार दान जरूर करें. शाम के समय तुलसी के पौधे के पास मिट्टी का दीपक जलाएं और यदि संभव हो तो उसकी सात बार परिक्रमा करें. ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए. इसलिए एक दिन पहले ही तुलसी के पत्ते तोड़कर पानी में सुरक्षित रख लें.

पद्मिनी एकादशी कथा: पूर्वकाल में त्रेतायुग में हैहय नामक वंश में कृतवीर्य नाम के एक राजा महिष्मती पुरी में राज्य करते थे. उस राजा की एक हजार अत्यंत प्रिय रानियां थीं, लेकिन उनमें से किसी को भी पुत्र प्राप्त नहीं हुआ था, जो उनके राज्य का भार संभाल सके. राजा ने देवताओं, पितरों, सिद्धों तथा अनेक वैद्यों की सहायता से पुत्र प्राप्ति के लिए बहुत प्रयास किए, परंतु सभी प्रयास असफल रहे. अंततः राजा ने तपस्या करने का निश्चय किया. उनकी परम प्रिय रानी पद्मिनी, जो इक्ष्वाकु वंश के राजा हरिश्चंद्र की कन्या थीं, भी उनके साथ वन जाने के लिए तैयार हो गईं. दोनों ने अपने मंत्री को राज्य का भार सौंप दिया और राजसी वस्त्र त्यागकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए. Advertisement

राजा ने उस पर्वत पर दस हजार वर्षों तक कठोर तप किया, लेकिन फिर भी उन्हें पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई. तब पतिव्रता रानी कमलनयनी पद्मिनी को माता अनुसूया ने बताया कि बारह महीनों से भी अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है, जो बत्तीस महीनों के बाद आता है. इस मास में शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी का व्रत, जागरण सहित करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इस व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर शीघ्र ही पुत्र का वरदान देते हैं. रानी पद्मिनी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से पद्मिनी एकादशी का व्रत किया. उन्होंने एकादशी के दिन निराहार रहकर रात्रि में जागरण किया. उनके इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया. उसी वरदान के प्रभाव से उनके यहां कार्तवीर्य नामक पुत्र का जन्म हुआ, जो अत्यंत बलवान था. तीनों लोकों में उसके समान कोई शक्तिशाली नहीं था और भगवान के अतिरिक्त कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता था.

हे नारद! जो मनुष्य मलमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करते हैं और इस पवित्र कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे यश के भागी बनते हैं और अंत में विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं.

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