सनातन धर्म में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी का त्योहार मनाया जाता है. इसे अक्षय नवमी और सीता नवमी के नाम से भी जाना जाता है. यह दिन विष्णु पूजा के लिए खास माना जाता है. अक्षय नवमी का दिन भी अक्षय तृतीया के समान ही अत्यन्त महत्वपूर्ण है. अक्षय तृतीया त्रेता युगा से मनाया जा रहा है. पुराणों में बताया गया है कि अक्षय नवमी के दिन ही सतयुग की शुरुआत हुई थी. इस वजह से अक्षय नवमी को “सत्य युगादि” भी कहा जाता है.
अक्षय नवमी में यहां करें भ्रमण
अक्षय नवमी के शुभ अवसर पर मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा का अत्यधिक महत्व है. सत्य युगादि के पावन दिन पर अक्षय पुण्य अर्जित करने हेतु हजारों भक्त मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा करते हैं. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है. इसके साथ ही परंपरागत रूप से अक्षय नवमी के शुभ दिन पर आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है. यही त्यौहार पश्चिम बंगाल में जगद्धात्री पूजा के रूप में मनाया जाता है. जिसके अन्तर्गत सत्ता की देवी, जगद्धात्री की पूजा की जाती है. इस दिन दान पुण्य को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है. इस दिन किसी भी तरह का दान धर्म करते हैं तो उसका अच्छा फल आपको मिलता है. इसका फल ना सिर्फ इस जन्म में बल्कि आने वाले जन्मों में भी आपको इस पुण्य का लाभ मिलता है.
आंवले के वृक्ष के निकट कैसे करें पूजा?
अक्षय नवमी की सुबह स्नान करके पूजा करने का संकल्प लें. प्रार्थना करें कि आंवले की पूजा से आपको सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य का वरदान मिले. पूर्व दिशा की ओर मुख करें और आंवले के पेड़ को जल अर्पित करें. वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें और कपूर से आरती करें. वृक्ष के नीचे निर्धनों को भोजन कराएं. स्वयं भी भोजन करें.
पूजा का शुभ मुहूर्त
अक्षय नवमी का त्योहार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है. इस बार कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि 9 नवंबर रात 10:45 बजे से लेकर 10 नवंबर को रात 9:01 बजे तक रहने वाली है. अक्षय नवमी की पूजा का मुहूर्त 10 नवंबर को सुबह 6 बजकर 40 मिनट से दोपहर 12 बजकर 5 मिनट तक रहने वाला है. इस शुभ मुहूर्त में आप अक्षय नवमी की पूजा और दान-धर्म का कार्य कर सकते हैं.
अक्षय नवमी की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में एक गरीब ब्राह्मण का परिवार रहता था. उस परिवार में भक्ति, श्रद्धा और सत्यनिष्ठा का निवास था, परंतु आर्थिक रूप से वे अत्यंत गरीब थे. एक बार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन ब्राह्मण दंपत्ति ने आंवले के वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की पूजा की और व्रत किया. उनके पास कुछ भी नहीं था, तो उन्होंने सिर्फ जल से भगवान की अभिषेक किया और आंवले का फल अर्पित किया.
इस श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उस ब्राह्मण परिवार को अक्षय फल का आशीर्वाद दिया. इसके पश्चात, उस परिवार का जीवन सुख-समृद्धि से भर गया. कहा जाता है कि इसी कारण इस दिन की पूजा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में धन, धान्य एवं खुशहाली आती है.
आंवला नवमी पर करें ये काम
वैसे तो पूरे कार्तिक मास में पवित्र नदियों में स्नान का माहात्म्य है लेकिन, नवमी को स्नान करने से इसका अक्षय पुण्य होता है. इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे भोजन बनाने और उसे ग्रहण करने का विशेष महत्त्व है. इससे उत्तम स्वास्थ मिलता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है. अक्षय नवमी के शुभ अवसर पर मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा भी की जाती है इसके फल स्वरूप व्यक्ति बैकुंठ धाम में स्थान पाता है.
















Leave a Reply