मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव जयंती मनाई जाती है. भगवान शिव की तंत्र साधना में भैरव का विशेष महत्व है. भैरव वैसे तो शिवजी के ही रौद्र रूप हैं, लेकिन कहीं-कहीं पर इन्हें शिव का पुत्र भी माना जाता है. ऐसी भी मान्यताएं हैं कि जो लोग भी शिव के मार्ग पर चलते हैं, उन्हें भैरव कहा जाता है. इनकी उपासना से भय और अवसाद का नाश होता है. व्यक्ति को अदम्य साहस मिल जाता है. शनि और राहु की बाधाओं से मुक्ति के लिए भैरव की पूजा अचूक होती है. इस बार कालाष्टमी 22 नवंबर यानी आज मनाई जा रही है.
हिन्दू पंचांग के अनुसार कालाष्टमी, हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. कालभैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है. ऐसे में काल भैरव की पूजा करने से इंसान भयमुक्त हो जाता है. इस पूजा को मनाने के लिए कुछ विधियां हैं तो आज हम आपको बताते हैं कि कालाष्टमी कैसे मनाएं.
कैसे मनाएं कालाष्टमी
मान्यताओं के मुताबिक कालाष्टमी भगवान शिव के भक्तों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन होता है. इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर जल्दी स्नान कर लेनी चाहिए. इस दिन काल भैरव के लिए एक विशेष पूजा की जाती है और अपने सभी जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगे. शिव के भक्त इस दिन जीवन में समृद्धि, सुख और सफलता हासिल करने के लिए उपवास करते हैं.

भगवान भैरव को प्रसन्न करने के उपाय
कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव की मूर्ति के आगे सरसो के तेल का एक दीपक जलाएं. इस दौरान श्रीकालभैरवाष्टकम् का पाठ करनी चाहिए. ऐसा करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है. कालाष्टमी के दिन ‘ॐ नम: शिवाय’ चंदन से लिखें और 21 बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाएं. इस दिन काले कुत्ते को रोटी खिलाएं. क्योंकि कुत्ते को काल भैरव की सवारी मानी जाती है.
भैरव के अलग-अलग स्वरूप और विशेषता शास्त्रों में भैरव के तमाम स्वरूप बताए गए हैं. असितांग भैरव, रूद्र भैरव, बटुक भैरव और काल भैरव आदि. मुख्यतः बटुक भैरव और काल भैरव स्वरूप की पूजा और ध्यान सर्वोत्तम मानी जाती है. बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है. इन्हें आनंद भैरव भी कहा जाता है. इस सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी होती है.
काल भैरव इनका साहसिक युवा रूप है. इनकी आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय की प्राप्ति होती है. असितांग भैरव और रूद्र भैरव की उपासना अति विशेष है, जो मुक्ति मोक्ष और कुंडलिनी जागरण के दौरान प्रयोग की जाती है.
कैसे करें काल भैरव की उपासना?
भैरव जी की पूजा संध्याकाल में करना उत्तम होता है. इनके सामने एक बड़े से दीपक में सरसों के तेल का दीपक जलाएं. इसके बाद उड़द या दूध से बनी चीजों को प्रसाद के रूप में अर्पित करें. विशेष कृपा के लिए इन्हें शरबत या सिरका भी अर्पित करें. तामसिक पूजा करने पर भैरव देव को मदिरा भी अर्पित की जाती है. प्रसाद अर्पित करने के बाद भैरव जी के मंत्रों का जाप करें.
भैरव की पूजा में सावधानियां
काल भैरव जयंती के दिन गृहस्थ लोगों को भगवान भैरव की तामसिक पूजा नहीं करनी चाहिए. सामान्यतः बटुक भैरव की ही पूजा करें. यह सौम्य पूजा है. काल भैरव की पूजा कभी भी किसी के नाश के लिए न करें. साथ ही काल भैरव की पूजा बिना किसी योग्य गुरु के संरक्षण के करना अनुचित है.
दान-पुण्य का है विशेष महत्व
इस दिन कुत्ते को दूध, दही और मिठाई भी खिलाया जाता है. इस उपाय को करने से बाबा भैरव और शनिदेव दोनों ही अपने भक्तों पर प्रस्सन होते हैं. इस दिन दान पुण्य का बहुत ही ज्यादा महत्व है. ऐसे में जरुरतमंदों और ब्राह्मणओं को अन्न, वस्त्र और धन का दान करें. इन उपायों को करने से बाबा भैरव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना को पूर्ण करते हैं.
















Leave a Reply