दफन हो गए गजनी से औरंगजेब तक… ‘सोमनाथ के पुनर्निर्माण पर आपत्ति जताने वाले आज भी हैं’

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के सोमनाथ मंदिर पहुंच गए हैं. पूजा शुरू हो गई है। इससे पहले पीएम ने शंख सर्किल पर शौर्य यात्रा निकाली. पीएम ने एक किमी लंबी यात्रा के दौरान डमरू भी बजाया. पूजा-अर्चना के बाद पीएम सुबह 11 बजे सद्भावना ग्राउंड में सार्वजनिक सभा को भी संबोधित किया.

PM मोदी शनिवार शाम सोमनाथ पहुंचे थे. यहां सोमनाथ मंदिर पर साल 1026 में हुए पहले आक्रमण के हजार साल पूरे होने पर ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मनाया जा रहा है. कार्यक्रम का नाम ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ PM ने ही रखा है. यह 8 से 11 जनवरी तक मनाया जा रहा है. सोमनाथ में अपने दौरे के पहले दिन, प्रधानमंत्री ने रोड शो किया था. उन्होंने सोमनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन किया, ऊं मंत्र के सामूहिक जप में हिस्सा लिया और ड्रोन शो देखा. 

पीएम मोदी ने शौर्य सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मैं अपना बहुत बड़ा सौभाग्य मानता हूं कि सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सक्रिय सेवा का अवसर मिला है. आज देश के कोने-कोने से लाखों लोग हमारे साथ जुड़े हैं, उन सबको मेरी तरफ से जय सोमनाथ. ये समय अद्भुत है, ये वातावरण अद्भुत है, ये उत्सव अद्भुत है. एक ओर देवाधिदेव महादेव, दूसरी ओर समुद्र की लहरें, सूर्य की किरणें, मंत्रों की ये गूंज, आस्था का ये उफान और इस दिव्य वातावरण में भगवान सोमनाथ के भक्तों की उपस्थिति… इस अवसर को भव्य और दिव्य बना रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को लेकर कहा कि इस आयोजन में गर्व है, गरिमा है, गौरव है और इसमें गरिमा का ज्ञान भी है. इसमें वैभव की विरासत है, इसमें अध्यात्म की अनुभूति है, अनुभूति है, आनंद है, आत्मीयता है और देवाधिदेव महादेव का आशीर्वाद है. पीएम मोदी ने कहा, ’72 घंटों तक अनवरत ओंकार नाद, 72 घंटों का अनवरत मंत्रोच्चार. मैंने देखा, कल रात 1000 ड्रोन द्वारा, वैदिक गुरुकुलों के 1000 विद्यार्थियों की उपस्थिति, सोमनाथ के 1000 वर्षों की गाथा का प्रदर्शन… और आज 108 अश्वों के साथ मंदिर तक शौर्य यात्रा, मंत्रों और भजनों की अद्भुत प्रस्तुति… सब कुछ मंत्र-मुग्ध कर देने वाला है. इस अनुभूति को शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, इसे केवल समय ही संकलित कर सकता है.’ 

पीएम मोदी ने 1026 ईस्वी में महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले हमले के 1000 वर्ष पूरे होने पर इतिहास को जिक्र करते हुए कहा, ‘एक हजार साल पहले, इसी जगह पर क्या माहौल रहा होगा. आप जो यहां उपस्थित हैं, उनके पुरखों ने, हमारे पुरखों ने जान की बाजी लगा दी थी… अपनी आस्था के लिए, अपने विश्वास के लिए, अपने महादेव के लिए उन्होंने अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया. हजार साल पहले वे आततायी सोच रहे थे कि उन्होंने हमें जीत लिया, लेकिन आज एक हजार साल बाद भी, सोमनाथ महादेव के मंदिर पर फहरा रही ध्वजा पूरी सृष्टि का आह्वान कर रही है कि हिंदुस्तान की शक्ति क्या है, उसका सामर्थ्य क्या है.’

गजनी-औरंगजेब इतिहास हुए, सोमनाथ वहीं है: PM 

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘जब गजनी से लेकर औरंगजेब तक तमाम आक्रांता सोमनाथ पर हमला कर रहे थे, तो उन्हें लग रहा था कि उनकी तलवार सनातन सोमनाथ को जीत रही है. लेकिन वे मजहबी कट्टरपंथी यह नहीं समझ पाए कि जिस सोमनाथ को वे नष्ट करना चाहते थे, उसके नाम में ही सोम अर्थात् अमृत जुड़ा हुआ है. उसमें हलाहल को पीकर भी अमर रहने का विचार जुड़ा है. उसके भीतर सदाशिव महादेव के रूप में वह चैतन्य शक्ति प्रतिष्ठित है, जो कल्याणकारक भी है और प्रचंड तांडव: शिव: यह शक्ति का स्रोत भी है. गजनी से औरंगजेब तक सोमनाथ पर हमला करने वाले तमाम आक्रांता इतिहास के चंद पन्नों में दफन होकर रह गए, लेकिन चिर-चिरातन सोमनाथ मंदिर सागर के तट पर उसी तरह तनकर खड़ा है.’

विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है सोमनाथ: PM 

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, 1,000 साल पहले हुए विध्वंस के स्मरण के लिए ही नहीं है. ये पर्व हजार साल की यात्रा का पर्व है. साथ ही, ये हमारे भारत के अस्तित्व और अभिमान का पर्व भी है. उन्होंने कहा, ‘सोमनाथ का इतिहास विनाश और पराजय का इतिहास नहीं है. ये इतिहास विजय और पुनर्निर्माण का है. सोमनाथ में विराजमान महादेव, उनका एक नाम मृत्युंजय भी है, मृत्युंजय जिसने मृत्यु को भी जीत लिया, जो स्वयं काल स्वरूप है. ये भी एक सुखद संयोग है कि आज सोमनाथ मंदिर की स्वाभिमान यात्रा के 1000 साल पूरे हो रहे हैं, साथ ही 1951 में हुए इसके पुनर्निर्माण के 75 साल भी पूरे हो रहे हैं. मैं दुनियाभर के करोड़ों श्रद्धालुओं को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं.’

तुष्टिकरण के ठेकेदारों ने कट्टरपंथ के आगे घुटने टेके

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत के पास सोमनाथ जैसे हजारों साल पुराने पुण्य स्थल हैं. ये स्थल हमारे सामर्थ्य, प्रतिरोध और परंपरा के पर्याय रहे हैं. लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद, गुलामी की मानसिकता वाले लोगों ने इनसे पल्ला झाड़ने का कोशिश की. उस इतिहास को भुलाने के कुत्सित प्रयास किए गए. तुष्टिकरण के ठेकेदारों ने इस कट्टरपंथी सोच के आगे घुटने टेके. जब भारत गुलामी की बेड़ियों से मुक्त हुआ, जब सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की शपथ ली, तो उन्हें भी रोकने की कोशिश की गई. 1951 में, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के यहां आने पर भी आपत्ति जताई गई. 

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