UP में पंचायत चुनाव से पहले कांग्रेस और सपा के गठबंधन में दरार पड़ गई है. कांग्रेस यूपी में पंचायत चुनाव अकेले लड़ेगी. यह फैसला बुधवार को दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के साथ हुई बैठक में लिया गया.
10 जनपथ पर सोनिया गांधी के आवास पर हुई बैठक में सांसद प्रमोद तिवारी, यूपी के प्रभारी अविनाश पांडे सहित प्रदेश के सभी 6 सांसद मौजूद रहे. सांसद प्रियंका गांधी भी मौजूद थीं.
फिलहाल, बिहार में झटका खाने के बाद कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश को लेकर अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी शुरू कर दी है. इससे पहले यूपी प्रदेश अध्यक्ष अजय राय अकेले सभी 11 एमएलसी चुनाव भी लड़ने की घोषणा कर चुके हैं.

सांसद तनुज पुनिया बोले- बैठक में कई मुद्दों पर बनी सहमति: बाराबंकी के साथ तनुज पुनिया ने कहा, पंचायत चुनाव कांग्रेस यूपी में अकेली लड़ेगी. 14 दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली होनी है. उसमें यूपी का क्या योगदान रहेगा? इस मुद्दे पर भी सांसदों से बात हुई है. सभी को रैली में ज्यादा से ज्यादा भीड़ लाने को कहा गया है. वोटर लिस्ट, वोर चोरी व संविधान के मुद्दों को जोर-शोर से उठाने की रणनीति बनाई गई है.
पंचायत चुनाव और एमएलसी की 11 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर कांग्रेस क्या संदेश देना चाहती है? आखिर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस गठबंधन से क्यों परहेज कर रही है? कांग्रेस की रणनीति क्या है?
यूपी प्रभारी के आवास पर एक दिन पहले हुई थी बैठक: 10 जनपथ से पहले मंगलवार की रात यूपी प्रभारी अविनाश पांडे के आवास पर यूपी के सांसदों इमरान मसूद, तनुज पुनिया, उज्जवल रमण सिंह, किशोरी लाल शर्मा, राकेश राठौर की बैठक हुई थी. इसमें प्रदेश अध्यक्ष अजय राय भी मौजूद रहे. वहां एक ब्लूप्रिंट पर चर्चा हुई. सांसदों की मौजूदगी में यूपी में कांग्रेस को मजबूत करने पर चर्चा की गई.
इस बैठक में हुई चर्चाओं का एक निचोड़ भी निकाला गया था, जिसे सोनिया गांधी के आवास पर हुई बैठक में पेश किया गया. कांग्रेस के यूपी नेताओं की ओर से अपने उच्च पदाधिकारियों को समझाया गया कि 2029 से पहले यूपी में कांग्रेस का बहुत कुछ दांव पर नहीं है. ऐसे में पार्टी को मजबूत करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए.
बिहार की तरह यूपी में भी एक सहमति बनी है कि लोकसभा में सपा को कांग्रेस की वजह से दलित वोट मिले थे लेकिन सपा की वजह से दलित पार्टी से जुड़ने में परहेज करते हैं. ऐसे में पार्टी पंचायत चुनाव में अकेले चुनाव लड़कर अपनी ताकत परखना चाहती है.
लोकसभा में कांग्रेस से बेहतर स्ट्राइक रेट रहा था सपा का: यूपी में कांग्रेस–सपा इंडिया गठबंधन के अहम साझेदार हैं. दोनों पार्टियों ने मिलकर 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ा था. सपा 2019 की तुलना में अपनी सीटों की संख्या 7 गुना बढ़ाकर 37 पर पहुंची तो कांग्रेस की सीटें भी छह गुना बढ़ गईं. मतलब दोनाें पार्टियों को गठबंधन से जबरदस्त फायदा हुआ.
गठबंधन में सपा 62 तो कांग्रेस 17 सीटों पर लड़ी थी. सपा 37 सीटें जीती, कांग्रेस को छह पर जीत मिली. कांग्रेस की सफलता की दर 35.29 और सपा की 57.17% रही. मतलब सपा की सफलता दर कांग्रेस की तुलना में ज्यादा थी. यूपी में इसी गठबंधन का कमाल था कि भाजपा खुद के बलबूते बहुमत नहीं जुटा पाई. इसकी टीस आज भी भाजपा काे सालती है.
2027 का विधानसभा चुनाव साथ लड़ने का ऐलान कर चुके हैं दोनों दल: लोकसभा में मिली सफलता के बाद से यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सपा–कांग्रेस गठबंधन मजबूत बना हुआ है. अखिलेश खुद कह चुके हैं कि 2027 में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ेंगे.
हालांकि गाहे–बगाहे कुछ बयानों को छोड़ दें तो दोनों पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में इस पर सहमति साफ दिखती है. वे सार्वजनिक मंचों से भी गठबंधन में ही चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं लेकिन बिहार चुनाव परिणाम के बाद से गठबंधन में सीटों को लेकर पेंच फंसता दिख रहा है.
बिहार में 61 सीटों पर लड़कर कांग्रेस सिर्फ 6 जीत पाई थी. अब यूपी में सपा कांग्रेस के इसी कमजोर प्रदर्शन के चलते 50 से 60 सीटों से ज्यादा देना नहीं चाहते हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा ने 340 सीटों पर चुनाव लड़ा था. 63 सीटें सहयोगियों के लिए छोड़ी थी. तब उसके गठबंधन में रालोद, सुभासपा जैसी पार्टियां थी, जो अब एनडीए का हिस्सा बन चुकी हैं. ऐसे में यही सीट सपा कांग्रेस को देना चाहती है.
















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