UP में अब ब्राह्मण विधायक भी लामबंद: बंद कमरे में मिले 52 MLAs , बढ़ा सियासी पारा

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यूपी में विधानमंडल का शीतकालीन सत्र चल रहा है. इस बीच, ब्राह्मण विधायकों का कुटुम्ब तैयार हो गया है. शीतकालीन सत्र के तीसरे दिन यानी मंगलवार शाम को कुशीनगर के भाजपा विधायक पीएन पाठक (पंचानंद पाठक) की पत्नी के जन्मदिन के नाम पर उनके लखनऊ आवास पर बैठक हुई.

इसमें पूर्वांचल और बुंदेलखंड के 45 से 50 ब्राह्मण विधायक शामिल हुए. विधायकों को लिट्टी चोखा और मंगलवार व्रत का फलाहार परोसा गया. पत्रकार से विधायक बने डॉक्टर शलभ मणि त्रिपाठी भी बैठक में पहुंचे.

मिर्जापुर विधायक रत्नाकर मिश्रा और एमएलसी उमेश द्विवेदी की मुख्य भूमिका रही है. खास बात है कि इस बैठक में अन्य पार्टियों के भी ब्राह्मण विधायक पहुंचे थे. सूत्रों का कहना है कि बैठक में कहा गया कि अलग-अलग जाति के खांचों में कई जातियां तो पॉवरफुल हो गईं, लेकिन ब्राह्मण पिछड़ गए हैं.

जाति की राजनीति में ब्राह्मणों की आवाज दबती जा रही है. उन्हें अनसुना कर दिया गया है। ब्राह्मणों के मुद्दों को उठाने जोर-शोर से उठाने के लिए यह जुटान हुई है. इन विधायकों का मानना है कि उनके समाज से डिप्टी सीएम तो हैं लेकिन उनको ताकत नहीं दिया गया.

ब्राह्मण विधायकों ने इसे सहभोज नाम दिया है. यूपी विधानसभा में इस समय 52 ब्राह्मण विधायक हैं, इनमें 46 भाजपा के हैं. विधानमंडल के मानसून सत्र में ठाकुर समाज के विधायकों ने कुटुंब परिवार के नाम पर बैठक कर तेवर दिखाए थे. अब ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने भाजपा और योगी सरकार की चुनौती बढ़ा दी है.

कौन-कौन सहभोज में शामिल हुआ, फोटो देखिए

बैठक में सीएम योगी के पूर्व मीडिया सलाहकार एवं देवरिया विधायक डॉक्टर शलभ मणि त्रिपाठी, पीएम नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव रहे नृपेंद्र मिश्रा के बेटे और एमएलसी साकेत मिश्रा, नौतनवां विधायक ऋषि त्रिपाठी, तरबगंज से विधायक प्रेमनारायण पांडेय, मिर्जापुर से विधायक रत्नाकर मिश्रा, बांदा विधायक प्रकाश द्विवेदी, बदलापुर से भाजपा विधायक रमेश मिश्रा, खलीलाबाद से विधायक अंकुर राज तिवारी और मेहनौन से भाजपा विनय द्विवेदी सहित अन्य विधायक बैठक में शामिल हुए.

इसके अलावा, एमएलसी उमेश द्विवेदी, धर्मेंद्र सिंह और बाबूलाल तिवारी भी बैठक में पहुंचे. इसके अलावा, ज्ञानपुर से विधायक विपुल दुबे, महोबा से विधायक राकेश गोस्वामी, विधायक विनोद चतुर्वेदी, संजय शर्मा, विवेकानंद पांडेय, अनिल त्रिपाठी, अंकुर राज तिवारी, सुभाष त्रिपाठी, अनिल पाराशर, कैलाशनाथ शुक्ला, प्रेमनारायण पाण्डेय, ज्ञान तिवारी और सुनील दत्त द्विवेदी भी मौजूद रहे.

प्रमुख मुद्दे जिन पर चर्चा की गई…

1-संघ, सरकार और भाजपा में सुनवाई नहीं: ब्राह्मण विधायकों की बैठक में चर्चा हुई कि समाज के लोगों की आरएसएस, भाजपा और सरकार में कोई सुनने वाला नहीं है. संघ, भाजपा और संगठन में ब्राह्मण समाज का ऐसा कोई बड़ा या जिम्मेदार पदाधिकारी नहीं है जिसके पास जाकर समाज के लोग अपनी बात रख सकें.

समाज के विधायकों, सांसदों और नेताओं की समस्या सुनने वाला कोई नहीं है. एक जाति विशेष के लोगों को खास तवज्जो दी जाती है, उस जाति के लोगों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने का काम किया था जबकि ब्राह्मणों की आबादी उनसे ज्यादा है और समाज हमेशा भाजपा के साथ रहा है.

बैठक में यह भी चर्चा हुई कि संगठन और सरकार में लगातार ब्राह्मणों की कद घटाया जा रहा है. बीजेपी में भी ब्राह्मण पदाधिकारियों की संख्या कम की गई है.

2- डिप्टी सीएम को ताकत नहीं: बैठक में मौजूद ब्राह्मण विधायकों का मानना था कि पार्टी ने समाज के विधायक ब्रजेश पाठक को डिप्टी सीएम बनाया है. लेकिन सरकार ने उन्हें ताकत नहीं दी है.

3- सुनील भराला नामांकन दाखिल नहीं हो सका था: भाजपा के ब्राह्मण नेता सुनील भराला भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में नामांकन दाखिल करने पहुंच गए थे. उनके पास पर्याप्त संख्या में ब्राह्मण और अन्य जातियों के प्रस्तावक भी थे. जानकारों का मानना है कि भराला ने ब्राह्मण समाज को मौका नहीं मिलने से नाराज होने के बाद ही नामांकन दाखिल करने का निर्णय किया था.

पार्टी के कई ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें समर्थन भी दिया था। लेकिन एन वक्त पर पार्टी नेतृत्व के दखल के कारण उन्होंने नामांकन दाखिल नहीं किया।

जनवरी में फिर होगी ब्राह्मण विधायकों की बैठक: ब्राह्मणों की एकजुटता के लिए समाज के विधायकों की बैठक जनवरी में एक बार फिर आहूत होगी. अगली बैठक में समाज के राजनीतिक और सामाजिक हित के लिए दिशा तय की जाएगी.

क्यों ब्राह्मण विधायकों ने बैठक करने का लिया निर्णय

1-ब्राह्मणों में बढ़ रही है भाजपा से नाराजगी: राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं- ब्राह्मणों में भाजपा से नाराजगी और असंतोष बढ़ता जा रहा है. ब्राह्मण समाज भाजपा का परंपरागत वोट बैंक रहा है. जब यूपी में भाजपा तीसरे चौथे नंबर की पार्टी थी, तब भी समाज का अधिकांश वोट भाजपा को मिलता था लेकिन बीते कुछ वर्षों से समाज उपेक्षित महसूस कर रहा है. समाज के विधायक भी संगठन और सरकार में उनकी सुनवाई नहीं होने की शिकायतें करते रहे हैं.

2- इटावा कांड के बाद ज्यादा मुखर: ब्राह्मणों में इटावा कथावाचक चोटी कांड के बाद गुस्सा और बढ़ा है. सूबे में ब्राह्मण बनाम यादव संघर्ष ने जोर पकड़ा तो कोई ब्राह्मण नेता वहां नहीं पहुंचा. जबकि अखिलेश यादव ने कथावाचक और उनके सहयोगी को लखनऊ बुलाकर सम्मानित किया था.

सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ कैंपेनिंग भी हुई। ब्राह्मण एकता नाम के फेसबुक अकाउंट से एक पोस्ट लिखी गई. जिसमें कहा गया है कि यूपी के 51 ब्राह्मण विधायकों पर थू है, कोई भी विधायक इटावा में ब्राह्मण समाज के लिए खड़ा नहीं हुआ.

वहीं, परशुराम सेना संघ ने आरोप लगाया कि ब्राह्मणों को सभी पार्टियां कमजोर करने में जुटी हुई हैं. 2027 में सभी को सबक सिखाया जाएगा.

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