नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत के साथ पेरेंट्स पर बच्चों की किताब, कॉपी और ड्रेस का आर्थिक बोझ बढ़ने लगा है. सबसे ज्यादा दिक्कत अंग्रेजी स्कूलों की किताबों को लेकर है, जोकि हर साल बदल जाती है और स्कूलों द्वारा तय की गई दुकानों पर ही मिलती है. कानपुर क्या लगभग हर बड़े-छोटे शहर के अधिकतर पब्लिक/ निजी स्कूलों की किताब कॉपी निर्धारित दुकानों पर ही मिलती है. दिक्कत पैरेंट्स को तब ज्यादा होती है जब हर साल किताब और कॉपी बदल जाते हैं. इससे उन पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है और बच्चों को भी सिलेबस को लेकर दिक्कतें होती है.
अस्पतालों की तरह ये पब्लिक स्कूल भी भ्रष्टाचार का वो हिस्सा बन चुके हैं जिनकों चलाने वाले सफेदपोश माफिया अतीक/मुख्तार से कम नहीं है. दुर्भाग्य यह है कि हमारी सरकारों का बुलडोजर इन तक पहुँचने के बारे में सोचता ही नहीं. इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि सरकार ने आज तक ऐसा कोई कारगर नियम/कानून बनाया ही जिससे इन पर प्रभावी कार्रवाई की जा सके.
राज्य से लेकर केंद्र सरकार का शिक्षा विभाग उदासीन और लाचार है जो कभी यह पूछने या जांचने की जहमत नहीं उठाता कि किस आधार पर मनमानी फीस और किताबे-कापियों के पैसे वसूल किये जा रहे है.
हर साल बदल जाती हैं किताबें: सिविल लाइंस स्थित एबीसी शॉप पर बच्चे की किताब खरीदने पहुंचे जयंत कुमार मिश्रा का कहना है कि किताबें हर साल बदलती हैं और निर्धारित दुकानों पर ही मिलती हैं. किताबों के अलावा कॉपियां भी निर्धारित दुकानों पर ही पैरेंट्स को लेना होता है. इससे पैरेंट्स को आर्थिक दिक्कतें होती हैं. जयंत मिश्रा का कहना है कि निर्धारित दुकानों को छोड़कर अगर किताब कॉपियां ली जाएं तो वहां एमआरपी रेट पर 20 फीसदी तक की छूट मिलती है, लेकिन निर्धारित दुकानों पर अगर आप खरीदते हैं तो कोई छूट नहीं मिलती है.
स्कूलों से लिस्ट मिलती है वही किताबें दुकान पर रखते हैं: वहीं, दुकानदार पंकज जायसवाल का कहना है कि निजी स्कूल जो लिस्ट किताबों की उपलब्ध करवाते हैं वही किताबें वह अपनी शॉप पर रखते हैं. इसके चलते सिर्फ पैरेंट्स ही नहीं बल्कि दुकानदारों को भी दिक्कतें होती है, क्योंकि हर साल किताब बदलने से उनके पास जो किताबें बच जाती हैं वह रद्दी के दाम बिकती हैं.
PM मोदी तो शायद ही इस बाबत सोच पाएं लेकिन अगर CM योगी संज्ञान यह समस्या आ जाती है तो कुछ न कुछ समाधान जरूर निकलेगा।
















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