पुनीत शुक्ला, कानपुर।
कानपुर में किडनी कांड में फंसे आहूजा हॉस्पिटल के मालिक डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा और उनकी पत्नी प्रीति आहूजा के साथ एजेंट शिवम अग्रवाल की जमानत अर्जी जिला जज अनमोल पाल की कोर्ट ने खारिज कर दी है.
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से तर्क रखा गया कि उन्हें झूठा फंसाया गया है, किडनी ट्रांसप्लांट कराने में उनकी कोई भूमिका नहीं है, जिसका अभियोजन की ओर से विरोध किया गया.
29 मार्च को पुलिस ने की थी छापेमारी: रावतपुर के केशवपुरम स्थित आहूजा हॉस्पिटल में बीते 29 मार्च को बिहार के बेगूसराय के रहने वाले एमबीए छात्र आयुष कुमार की किडनी मुफ्फरनगर की पारुल तोमर को लगाई गई। ऑपरेशन के दूसरे दिन पारुल को प्रिया हास्पिटल के आईसीयू जबकि आयुष को मेडलाइफ अस्पताल में भर्ती कराया। पुलिस को इस ऑपरेशन की जानकारी मिली तो छापेमारी की। पूरे मामले में अब तक 10 लोगों को जेल भेजा जा चुका है।
डॉ. अली ने कोर्ट में किया था सरेंडर: इनमें किडनी कांड के मास्टर माइंड रोहित तिवारी के साथ आहूजा अस्पताल की संचालक डॉ. प्रीति आहूजा, पति सुरजीत सिंह आहूजा, एजेंट शिवम अग्रवाल, मेडलाइफ अस्पताल के मालिक राजेश कुमार व राम प्रकाश कुशवाहा, प्रिया अस्पताल के संचालक नरेंद्र सिंह, गाजियाबाद के एक अस्पताल में ओटी मैनेजर राजेश कुमार व ओटी संचालक कुलदीप सिंह राघव और डॉ. अफजल का ड्राइवर परवेज सैफी शामिल है, जबकि 11 आरोपी डॉ मुद्स्सर अली सिद्दीकी उर्फ डॉ अली ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया था।
मुकदमे के मुख्य आरोपी आहूजा हॉस्पिटल के संचालक डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा और डॉ प्रीति आहूजा के साथ कानपुर में किडनी ट्रांसप्लांट का पूरा जिम्मा लेने वाले एजेंट शिवम अग्रवाल ने जिला जज की कोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की थी।
बचाव पक्ष की ओर से तर्क दिया गया, कि उनका ट्रांसप्लांट से कोई लेना–देना नहीं है। अभियोजन की ओर से डीजीसी दिलीप अवस्थी ने तर्क रखा कि किडनी ट्रांसप्लांट के इस मामले में सभी की अपनी-अपनी भूमिका थी।
कोर्ट ने गंभीर अपराध मानकर खारिज की याचिका: कोई किडनी लेने वाले को ढूंढता था तो कोई किडनी देने वाले की तलाश करता था। कोई कागजात तैयार करता था तो कोई आपरेशन करता था या उसमें सहयोग करता था।आपरेशन के बाद मरीज को अलग-अलग दूसरे अस्पताल में भेज दिया जाता था। यह सारा काम एक गिरोह द्वारा किया जाता था।
डाक्टर सुजीत और डाक्टर प्रीति और एजेंट शिवम अग्रवाल तीनों ही इस गिरोह में और अपराध में शामिल थे। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने गंभीर अपराध मानकर अर्जी खारिज कर दी।
















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