‘जिंदगी एक फूल समान है, इसे पूरी ताकत से खिलाओ.’ ये पंक्तियां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व को पूरी तरह बयान करती हैं. सरल स्वभाव वाले अटल जी ऐसे नेता थे, जिनके मित्र हर राजनीतिक दल में थे. आज पूर्व पीएम और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिवस है. उत्तराखंड में अटल जी से जुड़ी कई यादें हैं. अटल जी जब भी देहरादून आते थे, एक खास नीले रंग के वेस्पा स्कूटर से घूमा करते थे. स्कूटर पर वो कभी देहरादून तो कभी मसूरी पहुंच जाया करते थे.
देहरादून में भाजपा नेता नरेंद्र स्वरूप मित्तल अटल जी के करीबी मित्र थे. उनके साथ उन्होंने जिंदगी के कई यादगार पल बिताए. अपने छह साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल (1998 से 2004) के दौरान ही नहीं, बल्कि उससे पहले और बाद में भी वे इन दोनों शहरों में अक्सर आते रहे.

नीले रंग के स्कूटर से सवारी और ब्रीफकेस की कहानी: स्थानीय लोगों के अनुसार, अटल जी देहरादून और मसूरी में आम लोगों की तरह स्कूटर से घूमते थे. अपने करीबी मित्र नरेंद्र स्वरूप मित्तल के साथ वे 1964 मॉडल के स्कूटर पर शहर की गलियों में निकल पड़ते थे. दोनों साथ में देहरादून और मसूरी की सैर करते और लंबा वक्त बिताते थे. उस दौर में अटल जी ट्रेन से देहरादून आया करते थे. उनके पास एक छोटा सा ब्रीफकेस होता था, जिसमें धोती-कुर्ता, कुछ कपड़े, रुमाल और टूथब्रश रहता था. सादगी उनकी पहचान थी.
मैंगो शेक और मूंग की दाल बहुत पसंद थी: नरेंद्र स्वरूप मित्तल के बेटे और भाजपा नेता पुनीत मित्तल बताते हैं जब भी अटल जी देहरादून आते थे, तो वे उनके घर पर ही ठहरते थे. अटल जी को मैंगो शेक और मूंग की दाल बहुत पसंद थी. वे रोज़ 15 से 16 अखबार मंगवाते और उन्हें ध्यान से पढ़ते थे. पुनीत मित्तल का कहना है कि अटल जी फरवरी 1993 में उनकी शादी में भी शामिल हुए थे. अटल जी ने आखिरी बार 19 फरवरी 2007 को उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान देहरादून का दौरा किया था.
बीमार कार्यकर्ता से मिलने स्कूटर से पहुंचे: पुनीत मित्तल पुरानी यादें ताजा करते हुए बताते हैं कि एक बार अटल जी देहरादून आए हुए थे. उनका कार्यकर्ताओं से बेहद लगाव था। एक बार उन्हें एक कार्यकर्ता के बीमार होने की जानकारी मिली. उन्होंने तुरंत नीला स्कूटर उठाया और उस कार्यकर्ता से मिलने पहुंच गए.
लोगों की यादों में जीवित: भारत रत्न से सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री 1998 से 2004 तक रहे. वर्ष 2018 में 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, लेकिन देहरादून और मसूरी की गलियों में आज भी उनकी सादगी और अपनापन लोगों की यादों में जीवित है.
















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