अमावस्या पर सूर्य ग्रहण का संयोग, संगम में जरूर लगाएं डुबकी; मिलती है पितरों की आत्मा को मुक्ति

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हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल 17 फरवरी को फाल्गुन मास की अमावस्या तिथि पड़ रही है. इस बार की अमावस्या बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि इस दिन सूर्य ग्रहण का दुर्लभ संयोग भी बन रहा है. धार्मिक दृष्टिकोण से अमावस्या तिथि दान-पुण्य और पितृ तर्पण के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है. खासतौर पर लोग इस दिन तीर्थों के राजा, प्रयागराज में स्नान करते हैं. मान्यता है कि अमावस्या त्रिवेणी संगम में स्नान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. इसके अलावा मान्यता है यह भी है कि लोग इस दिन संगम में अपने पूर्वजों के नाम की डुबकी भी लगाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन संगम में पूर्वजों के नाम की डुबकी क्यों लगाई जाती है. आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं. 

अक्षय पुण्य का क्षेत्र है त्रिवेणी संगम: गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन स्थल को अक्षय क्षेत्र कहा जाता है. अक्षय का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो. मान्यता है कि संगम तट पर किया गया कोई भी शुभ कार्य, दान या पूजा जातक के खाते में जन्म-जन्मांतरों के लिए संचित हो जाती है. अमावस्या के अवसर पर यहां स्नान करने से न सिर्फ पापों का नाश होता है, बल्कि पितरों की आत्मा को भी मुक्ति मिल जाती है. यही वजह है कि फाल्गुन अमावस्याके दिन लोग पूर्वजों को याद करते हुए पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं.

प्रयागराज को क्यों कहते हैं पितरों की मुक्ति का द्वार:  मान्यता है कि जहां अन्य तीर्थ सिर्फ स्नान करने वाले का कल्याण करते हैं, वहीं तीर्थराज प्रयागराज की महिमा निराली है. शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक संगम में अपने पितरों के निमित्त डुबकी लगाता है, उसके पूर्वजों को भी नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलकर मोक्ष प्राप्त होता है. प्रयागराज में श्राद्ध और तर्पण कर्म करने से जातक की कई पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है. यहां की मिट्टी और जल में वह पवित्रता है जो आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करने की क्षमता रखती है.

स्वर्ग की सीढ़ी है त्रिवेणी संगम: सनातन धर्म में तीर्थ उसे कहा गया है जहां जाने मात्र से पूरी तरह पवित्र हो जाए. प्रयागराज के संगम क्षेत्र को स्वर्ग की सीढ़ी की संज्ञा दी गई है. पितृ पक्ष या अमावस्या के पावन अवसर पर यहां किया गया पिंडदान और तर्पण सीधे पितृ लोक तक पहुंचता है. मान्यता है कि संतान द्वारा श्रद्धा से किया गया पुण्य कार्य दिवंगत आत्माओं को संतुष्टि प्रदान करता है, जिससे पितृ दोष दूर होता है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है.

फाल्गुन अमावस्या पर क्या करें?

पवित्र स्नान- सूर्योदय के समय किसी पवित्र नदी, खासतौर पर संगम में स्नान करें.
तर्पण- पितरों के नाम से तिल और जल अर्पित करें.
दान- ग्रहण के संयोग के कारण इस दिन अन्न, तिल और गर्म वस्त्रों का दान करना विशेष फलदायी रहेगा.
दीपदान- शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे और नदी के किनारे दीप जलाएं.

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