Kalashtami Vrat Katha : तंत्र-मंत्र और नकारात्मक शक्तियों से निजात पाने के लिए कालाष्टमी का दिन विशेष माना जाता है. हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी व्रत रखा जाता है. फाल्गुन मास की मासिक कालाष्टमी 9 फरवरी 2026 को है. बाबा काल भैरव भगवान शिव के रौद्र रूप हैं. जिनकी पूजा करने से व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से मुक्त होता है और कई संकटों से भी रक्षा होती है. पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास की कालाष्टमी तिथि 9 फरवरी की सुबह 5 बजकर 01 मिनट से 10 फरवरी 2026 की सुबह 7 बजकर 27 मिनट तक है. चूंक काल भैरव की पूजा मुख्य रूप से निशा काल (रात्रि समय) में की जाती है, इसलिए व्रत और पूजन का 9 फरवरी को ही करना उचित होगा.
काशी के कोतवाल क्यों बने काल भैरव?
बाबा काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है. इसके पीछे एक कथा है, जिसे कालाष्टमी व्रत के दिन जरूर पढ़ना चाहिए. पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच कौन सबसे श्रेष्ठ इस बात को लेकर विवाद छिड़ गया. जिसे सुलझाने के लिए, देवताओं ने सभा बुलाई. सभा में, भगवान शिव ने अपनी एक ज्योति प्रकट की और ब्रह्मा और विष्णु से कहा कि जो भी इस ज्योति के अंत तक पहुंचेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा. विष्णु जी ज्योति के अंत तक नहीं पहुंच पाए, लेकिन ब्रह्मा जी ने झूठ बोला कि वे ज्योति के अंत तक पहुंच गए हैं.
चूंकि भगवान शिव को सच्चाई पता थी, इसलिए उन्होंने विष्णु जी को श्रेष्ठ घोषित किया. इससे क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने भगवान शिव को अपशब्द कहे, जिससे शिवजी को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने रौद्र रूप में काल भैरव को जन्म दिया. शिव जी के रौद्र स्वरूप काल भैरव ने ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काट दिया. तब से ब्रह्माजी के पास 4 मुख हैं. इसके बाद ब्रह्मा जी ने काल भैरव से माफी मांगी तब भगवान शिव अपने असली रूप में आए. लेकिन काल भैरव पर ब्रह्म हत्या का पाप लग गया था.
तब भगवान शिव ने भैरव को इस पाप से मुक्ति पाने के लिए काशी में प्रायश्चित करने को कहा. जिसके बाद शिवनगरी काशी में भैरव ने कोतवाल के रूप में भगवान शिव की सेवा की जिससे उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली. इसलिए, कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव की पूजा करने से भक्तों के सभी भय और कष्ट दूर होते हैं.
















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