SIR सही है, चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट से नाम हटाने-जोड़ने का पूरा अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

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सर्वोच्च न्यायालय ने आज 27 मई को SIR से जुड़े मामलों में बेहद अहम फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी SIR को कानूनी रूप से वैध ठहराया है. मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस प्रक्रिया के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को बरकरार रखा है.

CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने फैसले में कहा कि SIR प्रक्रिया को सिर्फ इसलिए ‘गैर-कानूनी कहकर रद्द नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह वोटर लिस्ट के आम पुनरीक्षण से अलग एक प्रक्रिया है. कोर्ट ने SIR को एक वैध और संवैधानिक प्रक्रिया बताया है। कोर्ट ने आगे कहा कि यह प्रक्रिया कानूनी रूप से सही है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की, किसी व्यक्ति को चुनावी प्रक्रिया में शामिल करने या न करने का फैसला लेने की शक्ति सीमित है और वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने से किसी व्यक्ति का नागरिकता का दर्जा समाप्त नहीं हो जाता. नागरिकता के दर्जे का निर्धारण केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा ही किया जा सकता है.

क्या है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का विवाद? चुनाव आयोग ने पिछले साल (जून 2025 में) बिहार से मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ की शुरुआत की थी, जिसे बाद में पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया गया. इस प्रक्रिया के तहत एक नियम यह रखा गया था कि जिन मतदाताओं के नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नहीं थे, उन्हें अपनी वंशावली साबित करने के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे ताकि यह पुष्टि हो सके कि उनके पूर्वजों का नाम पुरानी मतदाता सूची में दर्ज था.

याचिकाकर्ताओं की क्या थीं आपत्तियां? एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) के साथ-साथ योगेंद्र यादव और अन्य राजनीतिक नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ कई याचिकाएं दायर की थीं। उनके मुख्य तर्क थे:

अधिकार क्षेत्र से बाहर: याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत चुनाव आयोग के पास इतने बड़े स्तर पर इस तरह की जांच का अधिकार नहीं है.

NRC जैसी प्रक्रिया: उन्होंने आरोप लगाया कि यह नागरिकता को सत्यापित करने की एक ‘NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) जैसी’ प्रक्रिया है, और नागरिकता तय करना केवल केंद्र सरकार का अधिकार है, चुनाव आयोग का नहीं.

मतदाताओं को वंचित करना: यह चिंता जताई गई कि इस प्रक्रिया से कई असली मतदाता, विशेष रूप से वंचित, गरीब और प्रवासी लोग, जो दशकों पुराने दस्तावेज़ नहीं जुटा सकते, वे अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएंगे. अकेले बिहार में इसके तहत लाखों नाम हटाए जाने की बात सामने आई थी.

चुनाव आयोग (ECI) का क्या था पक्ष? चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी इस प्रक्रिया का मजबूती से बचाव किया। आयोग के तर्क इस प्रकार थे:

मतदाता सूची की शुद्धता: आयोग ने कहा कि मतदाता सूची को स्वच्छ और पारदर्शी बनाए रखना उनका संवैधानिक कर्तव्य है. मृत, दूसरे स्थान पर जा चुके (Migrated) और दोहरे नाम (Duplicate) वाले मतदाताओं को हटाना जरूरी है.

संवैधानिक अधिकार: ईसीआई ने संविधान के अनुच्छेद 324 और 326 का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता सूची में किसी को शामिल करना या बाहर करना उनके दायरे में आता है. साथ ही, यह सुनिश्चित करना भी उनका काम है कि कोई विदेशी नागरिक भारतीय चुनाव में वोट न डाल सके.

उदार प्रक्रिया: आयोग ने स्पष्ट किया कि यह कोई कठोर नागरिकता परीक्षण नहीं है, बल्कि ‘बूथ लेवल’ पर किया जाने वाला एक प्रशासनिक सत्यापन है.

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला 29 जनवरी 2026 को सीजेआई सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ ने सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ अंतरिम आदेश भी दिए थे कि ‘आधार कार्ड’ जैसे अतिरिक्त दस्तावेजों को भी सत्यापन के लिए मान्य किया जाए, ताकि लोगों को परेशानी न हो.

आज सुनाए गए अंतिम फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग द्वारा किया गया ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) असंवैधानिक नहीं है और मतदाता सूची को दुरुस्त करने का अधिकार पूरी तरह से निर्वाचन आयोग के संवैधानिक दायरे में आता है.

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