वैशाख शुक्ल सप्तमी को हर साल गंगा सप्तमी मनाई जाती है. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल गंगा सप्तमी 23 अप्रैल को मनाई जाएगी. पुराणों में गंगा को पतितपावनी कहा गया है. यानी मां गंगा हर प्रकार के पाप कर्मों को नष्ट कर पुण्य प्रदान करती हैं. यही वजह है कि इस दिन मां गंगा की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. इसके साथ ही इस दिन मां गंगा की विशेष कृपा पाने के लिए लोग ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर जरूरतमंदों के बीच दान करते हैं. मान्यता है कि इस दिन दान करने से अत्यधिक पुण्यफल की प्राप्ति होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गंगा सप्तमी क्यों मनाई जाती है? साथ ही मां गंगा का भगवान शिव और भागीरथ से क्या कनेक्शन है. आइए जानते हैं गंगा सप्तमी का शुभ मुहूर्त और महत्व.
कब है गंगा सप्तमी: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गंगा सप्तमी मनाई जाती है. दृक पंचांग के अनुसार, इस साल वैशाख शुक्ल की सप्तमी तिथि 22 अप्रैल को रात 10 बजकर 49 मिनट से शुरू होगी. जबकि, इस तिथि की समाप्ति 23 अप्रैल को रात 8 बजकर 49 मिनट पर होगी. ऐसे में उदया तिथि की मान्यता के अनुसार, इस साल गंगा सप्तमी 23 अप्रैल को ही मनाई जाएगी. गंगा सप्तमी पर पूजन के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 28 मिनट से लेकर दोपहर 2 बजकर 1 मिनट तक रहेगा.
क्यों मनाई जाती है गंगा सप्तमी? कहत हैं के गंगा सप्तमी के दिन मां गंगा का पुनर्जन्म हुआ था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं. कहते हैं कि उस वक्त गंगा का प्रवाह इतना अधिक था कि उसे नियंत्रित करना बहुत मुश्किल था. ऐसे में गंगा के वेग को नियंत्रित करने लिए भगवान शिव ने उसे अपनी जटाओं में धारण कर लिया. फिर, कुछ देर बाद भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं से मुक्त कर दिया ताकि भागीरथ के पूर्वजों की आत्मा को शांति मिल सके. चूंकि वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन ही जाह्नु ऋषि ने अपने कान से गंगा को मुक्ति किया था, इसलिए इस दिन गंगा सप्तमी मनाई जाती है.
क्या है गंगा सप्तमी की पौराणिक कथा: पौराणिक कथा के अनुसार, जब गंगा भागीरथ के पूर्वजों का उद्धार करने के लिए जा रही थीं, तो उस क्रम में उनके प्रवाह से ऋषि जाह्नु का आश्रम पूरी तरह से नष्ट हो गया. जिसके बाद ऋषि जाह्नु बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने गंगा का सारा पानी पी लिया. कहते हैं कि इस घटना के बाद भागीरथ समेत सभी देवताओं ने ऋषि जाह्नु से क्षमा याचना की और उनके गंगा को मुक्त करने की विनती की. कहते हैं कि भागीरथ समेत देवी-देवताओं की विनती से प्रसन्न होकर ऋषि जाह्नु ने गंगा को अपने कान से प्रवाहित कर मुक्त कर दिया.
















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