सनातन धर्म में बैसाखी त्योहार का विशेष महत्व है. यह खासतौर पर पंजाब और हरियाणा में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला एक कृषि उत्सव है. इसे वैसाखी के नाम से भी जाना जाता है. यह दिन न सिर्फ नई फसल (रबी) की कटाई की खुशी का प्रतीक है, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका गहरा महत्व है. सिख समुदाय के लिए यह दिन नववर्ष के रूप में नई उमंग लेकर आता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि इस साल बैसाखी का त्योहार कब मनाया जाएगा. इसके लिए सही तिथि और शुभ मुहूर्त क्या है. कब और कैसे शुरू हुई बैसाखी मनाने की परंपरा और इस त्योहार का महत्व क्या है.
बैसाखी 2026 डेट और शुभ मुहूर्त: सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार, हर साल मेष संक्रांति के दिन बैसाखी का त्योहार मनाया जाता है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस दिन सूर्य मीन से मेष राशि में प्रवेश करते हैं. ऐसे में दृक पंचांग के अनुसार, इस साल बैसाखी 14 अप्रैल को मनाई जाएगी. बैसाख संक्रांति का शुभ समय सुबह सुबह 9 बजकर 39 मिनट पर है. इसके साथ ही इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 57 मिनट से लेकर 5 बजकर 43 मिनट तक रहेगा. जबकि, अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से लेकर 1 बजकर 12 मिनट तक रहेगा.
कब और कैसे शुरू हुई बैसाखी मनाने की परंपरा? सिख इतिहास में बैसाखी का सबसे बड़ा मोड़ 13 अप्रैल 1699 को आया. इस दिन सिखों के 10वें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब की पावन धरती पर खालसा पंथ की नींव रखी. मान्यता है कि श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने ‘पंज प्यारों’ को अमृत छकाकर खालसा पंथ की नींव रखी. इसके साथ ही उन्होंने ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर सिखों को सिंह और कौर की उपाधि दी. कहते हैं कि तभी से यह दिन सिख समुदाय के जन्मदिन के रूप में मनाया जाने लगा.
क्या है बैसाखी पर्व का महत्व? ज्योतिषीय दृष्टिकोण से बैसाखी का दिन बहुत महत्वपूर्ण है. मान्यता है कि इसी दिन सूर्य देव अपनी बारह राशियों की यात्रा पूर्ण कर मेष राशि में प्रवेश करते हैं. यह घटना मेष संक्रांति कहलाती है, जिसे सिख नववर्ष के प्रारंभ के रूप में बड़े उत्साह से मनाया जाता है. कहते हैं कि इस दिन गुरु गोविंद सिंह जी ने ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की थी. इस दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है. चूंकि यह पर्व नई फसल की कटाई से भी जुड़ा है, इसलिए पंजाब-हरियाणा के किसानों के लिए यह दिन बेहद खास महत्व रखता है.
कैसे मनाएं बैसाखी का पर्व? बैसाखी के अवसर पर गुरुद्वारों को फूलों और रोशनी से भव्य रूप से सजाया जाता है. श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर गुरुद्वारों में माथा टेकते हैं, जहां विशेष अरदास और कीर्तन का आयोजन होता है. इसके साथ ही पंच प्यारों की अगुवाई में भव्य नगर कीर्तन निकाले जाते हैं. इस दिन लोग नए और रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं. इतना ही नहीं इस दिन ढोल की थाप पर पुरुष भांगड़ा करते हैं, जबकि महिलाएं पारंपरिक गिद्दा नृत्य करती हैं. इस दिन खासतौर पर गुरुद्वारों में विशाल लंगर का आयोजन होता है, जहां बिना किसी भेदभाव के सभी लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं.
















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