सभी पापों से मुक्ति देने वाली वरुथिनी एकादशी का व्रत अप्रैल में आज 13 तारीख को रखा जाएगा. वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 अप्रैल 2026 की देर रात 1 बजकर 16 मिनट से शुरू होगी और 13 अप्रैल 2026 की देर रात 1 बजकर 8 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के आधार पर एकादशी व्रत आज 13 अप्रैल को रखा जाएगा.
मान्यता है कि यह व्रत करने से पाप नष्ट होते हैं, साथ ही श्री हरि विष्णु भगवान अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण कर देते हैं. इस एकादशी पर जरूरतमंदों को दान भी जरूर दें. साथ ही व्रत-पूजा का पूरा फल पाने के लिए वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें.
आज के शुभ मुहूर्त और पारण का समय: आज 13 अप्रैल को पूजा के लिए कई शुभ योग बन रहे हैं. ज्योतिष गणना के अनुसार आज सुबह 06:12 बजे से लेकर दोपहर 12:20 बजे तक का समय पूजा के लिए अत्यंत श्रेष्ठ है. आज व्रत रखने वाले श्रद्धालु कल, यानी 14 अप्रैल को सुबह 05:56 से 08:30 के बीच व्रत खोल सकते हैं. पारण के समय द्वादशी तिथि का होना अनिवार्य है.
आज की सरल पूजा विधि: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें . भगवान विष्णु के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें. भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं. उन्हें पीले वस्त्र, पीले फूल और चंदन अर्पित करें. विष्णु जी को खरबूजे या आम जैसे मौसमी फलों का भोग लगाएं. याद रखें, बिना तुलसी दल (पत्ते) के भगवान भोग स्वीकार नहीं करते. वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें , अंत में घी के दीपक से आरती करें.
आज किए जाने वाले विशेष उपाय: अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आज आप ये छोटे उपाय कर सकते हैं:
आर्थिक उन्नति: आज भगवान विष्णु को 11 पीली कौड़ियां चढ़ाएं. अगले दिन उन्हें तिजोरी में रख दें.
पितृ दोष से मुक्ति: आज जल से भरे घड़े का दान करने से पितर प्रसन्न होते हैं. इससे घर में सुख-शांति आती है.
तुलसी पूजन: शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलाकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करते हुए 11 परिक्रमा करें.
आज इन बातों का रखें विशेष ध्यान: वरुथिनी एकादशी के नियम काफी कड़े माने जाते हैं. आज के दिन भूलकर भी चावल का सेवन न करें. साथ ही, आज के दिन किसी की बुराई करने, झूठ बोलने या क्रोध करने से बचना चाहिए. यदि व्रत नहीं भी रख रहे हैं, तो भी सात्विक भोजन ही ग्रहण करें.
वरुथिनी एकादशी व्रत कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को इस कथा को सुनाया था. यहां पढ़ें पूरी वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा.
प्राचीन काल की बात है नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करते थे. वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी थे. एक दिन की बात है कि वह जंगल में ही ध्यान मग्न होकर तपस्या कर रहे थे, तभी अचानक से वहां पर एक जंगली भालू आ गया और तपस्या में लीन राजा का पैर चबाने लगा. लेकिन राजा बिना किसी विघ्न के अपनी तपस्या में लीन रहे. कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते जंगली भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया.
राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा. उसकी पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला.
राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था. इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुए. उन्हें दुःखी देखकर भगवान विष्णु बोले: हे वत्स! शोक मत करो. तुम मथुरा जाओ और वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो. उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे. इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था.
भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक वरूथिनी एकादशी का व्रत किया. इसके प्रभाव से राजा शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया. इसी एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग गये थे.
जो भी व्यक्ति भय से पीड़ित है उसे वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए. इस व्रत को करने से समस्त पापों का नाश होकर मोक्ष मिलता है.
















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