ममता को बाहर का रास्ता दिखाने के गवर्नर के पास पर्याप्त अधिकार, अब ये होगा

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लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है, लेकिन अगर कोई मुख्यमंत्री हार के बावजूद कुर्सी छोड़ने को तैयार न हो, तो उस स्थिति में क्या होता है? भारतीय संविधान में राज्यपाल को ऐसी स्थिति से निपटने के लिए विशेष अधिकार दिए गए हैं, जो चुनाव हार चुके सीएम को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं. क्या ममता बनर्जी के गंभीर आरोपों और इस राजनीतिक गतिरोध के बीच राजभवन कड़े फैसले लेने पर मजबूर होगा? यह तो आने वाले दिनों में पता चल जाएगा. लेकिन पहले जानते हैं कि संविधान में ऐसी स्थिति के लिए क्या प्रावधान है.

संविधान में क्या है नियम? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति गवर्नर करते हैं और मुख्यमंत्री राज्यपाल के चाहने तक पद पर बने रहते हैं. इसका मतलब है कि मुख्यमंत्री को सदन का बहुमत बनाए रखना जरूरी होता है. अगर मुख्यमंत्री चुनाव हार जाएं या उनकी पार्टी बहुमत खो दे, तो उनकी संवैधानिक स्थिति कमजोर हो जाती है. यदि इसके बावजूद वे इस्तीफा नहीं देते, तो राज्यपाल अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर राज्यपाल मुख्यमंत्री को पद से हटाने का आदेश भी जारी कर सकते हैं. यह कदम लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए उठाया जाता है.

फ्लोर टेस्ट का भी है विकल्प: अगर मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार करते हैं, तो अगला कदम फ्लोर टेस्ट होता है. राज्यपाल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सरकार को बहुमत साबित करने का आदेश दे सकते हैं. इस दौरान मुख्यमंत्री को दिखाना होता है कि सदन में उनके पास पर्याप्त समर्थन है. बंगाल जैसे हालात में जहां बीजेपी के पास 207 सीटें और टीएमसी के पास केवल 80 सीटें हैं, वहां बहुमत साबित करना बेहद मुश्किल होगा. अगर सरकार फ्लोर टेस्ट हार जाती है, तो मुख्यमंत्री को पद छोड़ना पड़ता है. इसके बाद नई सरकार बनाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है.

… तो लग सकता है राष्ट्रपति शासन? यदि मुख्यमंत्री चुनाव हारने के बाद भी अड़ियल रवैया अपनाते हैं और इस्तीफा देने से पूरी तरह इनकार कर देते हैं, तो इसे ‘संवैधानिक मशीनरी की विफलता’ माना जाता है. ऐसी विकट स्थिति उत्पन्न होने पर राज्यपाल केंद्र सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट भेज सकते हैं और अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं. एक बार राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद मुख्यमंत्री की सभी शक्तियां शून्य हो जाती हैं और राज्य की पूरी कमान सीधे तौर पर केंद्र सरकार और राज्यपाल के हाथों में चली जाती है.

आदेश मानने पर लग सकती है रोक: कानूनी तौर पर बहुमत खोने वाला व्यक्ति शासन करने का वैध अधिकार खो चुका होता है और इस्तीफा देना एक अनिवार्य संवैधानिक प्रक्रिया है. यदि हारने वाला नेता पद नहीं छोड़ता, तो राज्यपाल प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दे सकते हैं कि वे मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) या सचिवालय में पुराने मुख्यमंत्री के किसी भी आदेश का पालन न करें. राज्यपाल की ये शक्तियां यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि लोकतंत्र की भावना बरकरार रहे और जनता के दिए गए जनादेश का किसी भी स्थिति में अपमान न हो.

CM का इस्तीफा सिर्फ एक नैतिक परंपरा है न कि… मुख्य मंत्री का इस्तीफा चुनाव हारने के बाद लोकतांत्रिक और नैतिक परंपरा जरूर माना जाता है, लेकिन यह हर स्थिति में संवैधानिक अनिवार्यता नहीं होता. अगर Mamata Banerjee इस्तीफा देने से इनकार भी करती हैं, तब भी तुरंत संवैधानिक संकट जैसी स्थिति पैदा नहीं होगी. जब कोई मुख्यमंत्री बहुमत खो देता है, तब आमतौर पर Governor उन्हें नई सरकार के शपथ लेने तक कार्यवाहक रूप में पद पर बने रहने को कह सकते हैं. नई सरकार के शपथ लेते ही पुराने मुख्यमंत्री का कार्यकाल स्वतः समाप्त हो जाता है, चाहे उन्होंने औपचारिक इस्तीफा दिया हो या नहीं.

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