‘मदरसों में सिखाते हैं नफरत, हिन्दुओं पर जुल्म’, तसलीमा नसरीन ने खोला बांग्लादेश का कच्चा-चिट्ठा

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भारत आईं बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपने देश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है. समाचार एजेंसी ANI को दिए एक विशेष इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में राजनीतिक नेतृत्व बदलने के बावजूद अल्पसंख्यकों की स्थिति में कोई बड़ा सुधार दिखाई नहीं देता. उनके मुताबिक, चाहे अलग-अलग सरकारें सत्ता में रही हों, लेकिन धार्मिक कट्टरता और अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमलों को लेकर प्रभावी कार्रवाई का अभाव बना हुआ है.

तसलीमा नसरीन ने कहा कि वह पिछले चार दशकों से समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की समर्थक रही हैं. उनका मानना है कि किसी भी आधुनिक और सभ्य राष्ट्र में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून होना चाहिए. उन्होंने दावा किया कि बांग्लादेश में धार्मिक कानूनों का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है. उन्होंने कहा कि वहां हिंदू महिलाओं को कई बुनियादी अधिकार भी नहीं मिलते. यहां तक कि उन्हें तलाक का अधिकार भी प्राप्त नहीं है. उनके अनुसार धार्मिक आधार पर बने कानून महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता में सबसे बड़ी बाधा हैं.

‘चार दशक से UCC की वकालत कर रही हूं’: महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा उठाते हुए तसलीमा नसरीन ने समान नागरिक संहिता (UCC) की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि वह पिछले लगभग 40 वर्षों से इस विषय पर अपनी आवाज उठा रही हैं. उनके मुताबिक, धर्म आधारित व्यक्तिगत कानून कई बार महिलाओं को समान अधिकार देने में असफल रहते हैं. उन्होंने दावा किया कि बांग्लादेश में प्रचलित कुछ धार्मिक कानूनों के कारण महिलाओं को संपत्ति और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े मामलों में बराबरी नहीं मिल पाती. उनका मानना है कि महिलाओं को समान कानूनी संरक्षण और अधिकार मिलना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी आवश्यकता है.

‘धर्म की आलोचना की तो देश छोड़ना पड़ा’: तसलीमा नसरीन ने अपने जीवन के कठिन दौर का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि धार्मिक कट्टरता की आलोचना करने के कारण उन्हें अपने देश से निर्वासन का सामना करना पड़ा. उनके खिलाफ फतवे जारी हुए और उन्हें जान से मारने की धमकियां भी मिलीं. उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी आवाज दबने नहीं दी. आज भी वह महिलाओं के अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर लगातार बोल रही हैं.

‘यूनुस शासन में हिंदुओं पर बढ़े हमले’: लेखिका ने आरोप लगाया कि मौजूदा दौर में बांग्लादेश के हिंदुओं की स्थिति पहले से ज्यादा खराब हुई है. उन्होंने कहा कि यूनुस शासन के दौरान हिंदू समुदाय पर अत्याचार की घटनाओं में बढ़ोतरी देखने को मिली. उनके मुताबिक देश के कई मदरसों और मस्जिदों में हिंदुओं के खिलाफ नफरत का माहौल तैयार किया जा रहा है, जो समाज के लिए बेहद चिंताजनक है.

‘जमात-ए-इस्लामी की सोच महिलाओं की बराबरी के खिलाफ’: तसलीमा नसरीन ने कहा कि बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी जैसे राजनीतिक दल महिलाओं की समानता के विरोधी हैं. उनका आरोप है कि यह संगठन देश में शरिया कानून लागू करना चाहता है. उन्होंने आशंका जताई कि यदि ऐसा हुआ तो अल्पसंख्यकों के लिए देश में सुरक्षित रहना मुश्किल हो जाएगा. उन्होंने कहा कि बांग्लादेश धीरे-धीरे ऐसे रास्ते पर बढ़ रहा है, जहां लोकतांत्रिक और आधुनिक मूल्यों की जगह कट्टरपंथ हावी होता जा रहा है. उनके मुताबिक सरकार का पूरा ध्यान केवल सत्ता में बने रहने पर है, जबकि समाज को आगे बढ़ाने के प्रयास कमजोर पड़ गए हैं.

अवामी लीग पर प्रतिबंध को बताया लोकतंत्र के खिलाफ: तसलीमा नसरीन ने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और अवामी लीग का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लगाना लोकतंत्र के हित में नहीं है. उनके अनुसार जिस तरह शेख हसीना को देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, वह कई सवाल खड़े करता है. उन्होंने कहा कि अवामी लीग पर लगाया गया प्रतिबंध जल्द हटाया जाना चाहिए. उनका दावा है कि पार्टी के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया गया और उनकी हत्या तक कर दी गई.

‘शेख हसीना लौटना चाहती हैं, लेकिन…‘तसलीमा नसरीन ने कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार शेख हसीना बांग्लादेश लौटना चाहती हैं, लेकिन मौजूदा हालात में यह कितना संभव होगा, इस पर कुछ कहना मुश्किल है. उन्होंने यह भी कहा कि जहां शेख हसीना की वापसी की चर्चा हो रही है, वहीं उन्हें खुद अपने देश लौटने का अवसर नहीं मिल पा रहा है. उनके शब्दों में, “कोई भी नहीं चाहता कि मैं बांग्लादेश वापस जाऊं.’

1994 से निर्वासन का जीवन जी रही हैं तस्लीमा: तस्लीमा नसरीन वर्ष 1994 से निर्वासन का जीवन जी रही हैं. उन्होंने बताया कि उन्हें सेक्युलर मिशन के प्रमुख उस्मान गनी मलिक के निमंत्रण पर कोलकाता आने का अवसर मिला. लगभग दो दशक बाद उनकी यह वापसी साहित्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक विमर्श के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम मानी जा रही है.

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