सनातन धर्म में भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए हर महीने प्रदोष व्रत रखा जाता है. जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं. सावन में पहला प्रदोष व्रत 1 अगस्त दिन गुरुवार को पड़ रहा है. गुरुवार के प्रदोष व्रत रखने से शिव भगवान के साथ गुरु बृहस्पति देव की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है. प्रदोष व्रत में शाम का समय पूजा के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है.
मान्यता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर नृत्य करते हैं. इस दिन सभी शिव मन्दिरों में शाम के समय प्रदोष मंत्र का जाप किया जाता है.
वैसे हर महीने की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है. लेकिन सावन में आने वाले प्रदोष व्रत की महिमा अलग है. शास्त्रों में इसे भगवान शिव की विशेष कृपा पाने का दिन बताया गया है. कहते हैं कि सावन में पड़ने वाले प्रदोष व्रत में महादेव की पूजा से व्यक्ति को मनचाहा फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा शाम के समय सूर्यास्त से 45 मिनट पूर्व और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक की जाती है.
सावन प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त
सावन प्रदोष व्रत में आज पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 11 मिनट से लेकर रात को 9 बजकर 18 मिनट तक रहेगा. इस अवधि में भगवान शिव की पूजा करें. उनके मंत्रों का जाप करें और जरूरतमंदों, गरीबों को दान-दक्षिणा दें.
सावन प्रदोष व्रत की पूजन विधि
सावन के पहले प्रदोष व्रत के शुभ अवसर पर सवेरे-सवेरे उठकर स्नान करें और सफेद या पीले वस्त्र धारण करें. इस दिन काले रंग के कपड़े पहनने से बचना है. इस दिन पूरे घर में गंगा जल का छिड़काव करना है. शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव का दूध, दही और पंचामृत से अभिषेक करें. उसके बाद भगवान शिव को पीले या सफेद चंदन से टीका लगाएं. भगवान शिव को भांग, धतूरा और बेलपत्र अर्पित करें और उन्हें पुष्प चढ़ाकर भगवान शिव की आराधना करें. साथ ही साथ ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप भी करना है. माता पार्वती का भी ध्यान लगाना है.
प्रदोष व्रत के उपाय
1. व्यापार में लाभ- मिट्टी के तीन दीपक में पीली सरसों के दाने, तिल, साबुत नमक और साबुत धनिया मिलाकर अपने व्यापार स्थल पर रख दें. इससे व्यापार में वृद्धि होने लगेगी .
2. पढ़ाई-लिखाई में सफलता- लाल मिर्च के बीज निकालकर इन्हें जल में मिलाएं. दिन में किसी भी समय इस जल को सूर्य को अर्पित करें. डिप्रेशन की समस्या में निजात मिलेगा.
3. परिवार में सुख-शांति- इस दिन महादेव को दही और शहद मिश्रित भोग अर्पित करें. माना जाता है कि ऐसा करने से पारिवारिक जीवन में आ रहे क्लेश दूर हो जाते हैं.
4. शत्रुओं पर विजय- शिव जी को गंगाजल से साफ किया गया शमी पत्र अर्पित करना चाहिए. साथ ही वहां बैठकर ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करें.
इन्द्र और वृत्रासुर में यूद्ध
भागवत पुराण के 13वें अध्याय के अनुसार, एक बार इन्द्र और वृत्रासुर में जमकर युद्ध हुआ. उस समय देवताओं ने राक्षसों की सेना को पराजित कर खत्म दिया था. अपना विनाश देख वृत्रासुर क्रोध आया और आसुरी माया से भयंकर विकराल रूप धारण कर लिया. उसके स्वरूप को देख सभी देवताओं ने इन्द्र देव के परामर्श से परम गुरु बृहस्पति का आवाह्न किया.
गुरु तत्काल आकर कहने लगे-हे देवेन्द्र! अब तुम वृत्रासुर की कथा ध्यान मग्न होकर सुनो- वृत्रासुर प्रथम बड़ा तपस्वी कर्मनिष्ठ था, इसने गन्धमादन पर्वत पर उग्र तप करके शिवजी को प्रसन्न किया था. पूर्व समय में यह चित्ररथ नाम का राजा था, तुम्हारे समीप जो सुरम्य वन है वह इसी का राज्य था. अब साधु प्रवृत्ति विचारवान् महात्मा उस वन में आनन्द लेते हैं. भगवान के दर्शन की अनुपम भूमि है. एक समय चित्ररथ स्वेच्छा से कैलाश पर्वत पर चला गया.
भगवान शिव का उड़ाया था मजाक
भगवान का स्वरूप और वाम अंग में जगदम्बा को विराजमान देख चित्ररथ हंसा और हाथ जोड़कर शिव शंकर से बोला- हे प्रभु! हम माया मोहित हो विषयों में फंसे रहने के कारण स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं किन्तु देव लोक में ऐसा कहीं मोचर नहीं हुआ कि कोई स्त्री सहित सभा में बैठे चित्ररथ के ये वचन सुनकर सर्वव्यापी भगवान शिव हंसकर बोले कि हे राजन्! मेरा व्यवहारिक दृष्टिकोण पृथक है. मैंने मृत्युदाता काल कूट महाविष का पान किया है. फिर भी तुम साधारण जनों की भांति मेरी हंसी उड़ाते हो.
तभी पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ की ओर देखती हुई कहने लगी-ओ दुष्ट तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ मेरी भी हंसी उड़ाई है, तुझे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ेगा. उपस्थित सभासद महान विशुद्ध प्रकृति के शास्त्र तत्वान्वेषी हैं, और सनक सनन्दन सनत्कुमार हैं हे सर्व अज्ञान के नष्ट हो जाने पर शिव भक्ति में तत्पर हैं, अरे मूर्खराज! तू अति चतुर है अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के मजाक का दुःसाहस ही नहीं कर पाएगा.
माता पार्वती ने दिया श्राप
अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, तुझे मैं श्राप देती हूं कि अभी पृथ्वी पर चला जा. जब जगदम्बा भवानी ने चित्ररथ को ये शाप दिया तो वह तत्क्षण विमान से गिरकर, राक्षस योनि को प्राप्त हो गया और प्रख्यात महासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ. तवष्टा नामक ऋषि ने उसे श्रेष्ठ तप से उत्पन्न किया और अब वही वृत्रासुर शिव भक्ति में ब्रह्मचर्य से रहा है. इस कारण तुम उसे जीत नहीं सकते, अतएव मेरे परामर्श से यह प्रदोष व्रत करो जिससे महाबलशाली दैत्य पर विजय प्राप्त कर सको. गुरुदेव के वचनों को सुनकर सब देवता प्रसन्न हुए और गुरुवार त्रयोदशी (प्रदोष) व्रत विधि विधान से किया. प्रदोष व्रत विधि-विधान से करने के बाद भी देवता वृत्रासुर का वध कर पाए थे.
प्रदोष व्रत कथा
स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती थी और संध्या को लौटती थी. एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था. शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था. उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी. ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया.
कुछ समय बाद ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई. वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई. ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भ देश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था. तब ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी थी.
ऋषि की आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया था. एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई. ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त ‘अंशुमती’ नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगा. गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए. कन्या ने विवाह हेतु राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया.
दूसरे दिन जब वह पुन: गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है. भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से करा दिया. इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया. यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का ही फल था. स्कंदपुराण के अनुसार, जो भक्त प्रदोष व्रत के दिन शिवपूजा के बाद एकाग्र होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है और जीवन में कभी कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता है.
















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