भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत रखना कई संकटों का नाश करता है और मनोकामनाएं पूरी करता है. ज्येष्ठ महीने का पहला प्रदोष व्रत आज 14 मई 2026, गुरुवार को है. गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा. जिससे आज भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की पूजा करना अपार फल देगा. जानिए प्रदोष व्रत पूजा का शुभ मुहूर्त, कथा और मंत्र.
गुरु प्रदोष व्रत पूजा समय: ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 14 मई को दोपहर 11 बजकर 21 मिनट से 15 मई को सुबह में 8 बजकर 32 मिनट तक रहेगी. उदयातिथि के आधार पर आज प्रदोष व्रत रखा जाएगा और पूजा करने के लिए सबसे शुभ मुहूर्त शाम को 5 बजकर 22 मिनट से 7 बजकर 4 मिनट तक रहेगा.
प्रदोष व्रत की पूजा में शाम को विधिवत तरीके से भगवान शिव की पूजा करना चाहिए. इसके लिए शाम को स्नान करें. फिर भगवान शिव का अभिषेक पूजन करें. प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें, मंत्र जाप करें. आरती करें. ऐसा करने से ही व्रत का पूरा फल मिलता है.
गुरु प्रदोष व्रत की कथा: इस व्रत कथा के अनुसार एक बार इंद्र और वृत्तासुर की सेना में घनघोर युद्ध हुआ. देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर नष्ट-भ्रष्ट कर डाला. यह देख वृत्तासुर अत्यंत क्रोधित हो स्वयं युद्ध को उद्यत हुआ. आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया. सभी देवता भयभीत हो गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहूंचे. बृहस्पति महाराज बोले- पहले मैं तुम्हें वृत्तासुर का वास्तविक परिचय दे दूं.
वृत्तासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है. उसने गंधमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर शिवजी को प्रसन्न किया. पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा था. एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया. वहां शिवजी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख वह उपहासपूर्ण बोला- ‘हे प्रभो! मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं किंतु देवलोक में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे.’
चित्ररथ के यह वचन सुन सर्वव्यापी शिव शंकर हंसकर बोले- ‘हे राजन! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण पृथक है. मैंने मृत्युदाता-कालकूट महाविष का पान किया है, फिर भी तुम साधारणजन की भांति मेरा उपहास उड़ाते हो!’ माता पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ से संबोधित हुईं- ‘अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ ही मेरा भी उपहास उड़ाया है अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के उपहास का दुस्साहस नहीं करेगा- अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, मैं तुझे शाप देती हूं.’
जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हुआ और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्तासुर बना. गुरुदेव बृहस्पति आगे बोले- ‘वृत्तासुर बाल्यकाल से ही शिवभक्त रहा है अत हे इंद्र! तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर शंकर भगवान को प्रसन्न करो.’ देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया. गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इंद्र ने शीघ्र ही वृत्तासुर पर विजय प्राप्त कर ली और देवलोक में शांति छा गई. अत: प्रदोष व्रत हर शिव भक्त को अवश्य करना चाहिए.
शिव मंत्र
भगवान शिव का गायत्री मंत्र : ‘ऊं तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥’
महामृत्युंजय मंत्र : ‘ऊं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥’
शिव जी का पंचाक्षरी मंत्र : ‘ऊं नम: शिवाय’
















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